संवाद


"राम का नाम बदनाम ना करो,


देखो ऐ दीवानो!तुम ये काम ना करो"


हमारे पड़ोस में "राम का नाम बदनाम ना करो....यह गाना तेज आवाज में बज रहा था।एक तरफ आवाज से परेशानी भी हो रही थी, दूसरी तरफ गाने के शब्दों से और संदेश से आज के हालात को समझने में आसानी भी हो रही थी। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्म दिवस "रामनवमी" की तैयारी में हम लगे थे और इस गाने की बोल हमें चेताने में लगा था। गाना खत्म होते-होते एक ही प्रश्न दिलो-दिमाग में गूंजने लगा- "कहीं अनजाने में 'रक्षा में हत्या' की गलती तो नहीं हो रही है?" अन्यथा रामनवमी की शुभ बेला हो और रमजान का पवित्र महीना हो तो गुलशन में प्रेम के फूल ही फूल खिल जाते। लेकिन-


"तड़पता आदमी सब्रो क़रार क्या जाने?


जो नफरतों में पला हो वो प्यार क्या जाने??"


राम नाम की अद्भुत महिमा है। इस नाम के आधार मात्र से शिला (पत्थर) भी पानी पर फूल की तरह तिर जाता है और इनका उल्टा नाम लेने पर भी 'मरा-मरा' कहता हुआ बाल्या-भील दस्यु से रूपांतरित होकर रामायण लिखने वाला ऋषि-वाल्मीकि बन जाता है।


उस राम को जन्म देने वाली माता और धरती कितनी सौभाग्यशाली होगी! माता का नाम "कौशल्या" था जिसका एक अर्थ कल्याण होता है और धरती का नाम "अयोध्या" था -जिसका अर्थ होता है 'जहां युद्ध न हो' अर्थात् 'जिसके मन के अंदर और बाहर का संघर्ष समाप्त हो गया हो,शांत हो गया हो।'


कल्याण रूपी मां से और शांत धरती पर ही राम का जन्म हो सकता है-


भए प्रगट कृपाला,दीन दयाला....


उन "राम" का दिन रात गुणगान करने वाली और नारा लगाने वाली जनता के सौभाग्य का तो कहना ही क्या!


राम नाम की महिमा का जिंदा उदाहरण मैंने अपने घर में ही देखा। मेरे पिताजी का नाम श्री रामदेव था। भारतीय सेना के सैनिक के रूप में अनेक युद्धों में उन्होंने भाग लिया और यूएनओ की शांति सेना के सैनिक के रूप में कई देशों में जाकर अपनी सेवाएं भी दीं। उनको बचपन से हर सुबह रामचरितमानस की पोथी लेकर शांत मुद्रा में प्रेम से राम का नाम लेते हुए देखता था। इसके कारण उनके चेहरे पर इतना सौंदर्य और हृदय में इतना प्रेम भरा होता था कि लोग उन्हें "सैनिक-संत" कहते थे। घर में अन्न व धन के मामले में थोड़ा अभाव रहता था क्योंकि कमाने वाले पिताजी अकेले और खाने वाले ज्यादा थे किंतु राम नाम के प्रभाव के कारण घर में सुख-शांति थी। उनकी कामना राम नाम की आराधना की थी, इसके अतिरिक्त और ज्यादा की कामना ही नहीं थी-


"साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए


मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।"


रामकृष्ण परमहंस के सामने तो राम शब्द किसी भी रूप में उच्चारित हो जाता था तो उनको समाधि लग जाया करती थी। शिष्यों को बहुत परेशानी होती थी क्योंकि रास्ते पर रामकृष्ण को ले जाया जाता था तो कोई राम-राम कह दे या जय सियाराम कह दे या जय श्री राम कह दे, वहीं पर वे ध्यान मग्न हो कई घंटे ही नहीं बल्कि कई दिनों के लिए राम की सुध और सुगंध से भर जाते थे। उन्होंने इस्लाम,ईसाई, हिंदू सभी साधना पद्धतियों से उस परम तत्व राम को पा लिया था।


आज रामनवमी का शुभ दिन उस राम के स्मरण मात्र का ही दिन नहीं बल्कि चिंतन-मनन का भी दिन होना चाहिए क्योंकि आरोप लग रहा है कि राम का नाम लेकर डराया जा रहा है,धमकाया जा रहा है और नफरत का बीज बोया जा रहा है।


प्रेम और करुणा के प्रतीक राम का उपयोग क्या घृणा और क्रूरता फैलाने के लिए किया जा सकता है?


ऐसा कुछ लोगों को संभव तो नहीं दिखता लेकिन इस दुनिया में असंभव भी कुछ नहीं है क्योंकि फूल को भी पत्थर की तरफ फेंक कर किसी की जान ली जा सकती है। इसमें दोष फूल का नहीं बल्कि फेंकने वाले के अंदर के भाव का है -


"जाकी रही भावना जैसी,प्रभु मूरत देखी तिन तैसी"


राम रूपी प्रेम-पुष्प का पत्थर की तरह इस्तेमाल करने वालों को एक दृष्टांत सुनना चाहिए और समझना चाहिए। रावण अशोक वाटिका में सीता के सामने प्रत्येक दिन यह निवेदन करने जाता था कि राम को भूल जाओ और मुझे प्रेम करो। किंतु सीता टस से मस नहीं हुई। तब किसी ने सलाह दी कि हे रावण! तू तो मनचाहा रूप धारण कर सकता है। राम का रूप धारण करके तू क्यों नहीं जाता ताकि सीता का प्रेम पा सके।


रावण ने अद्भुत बात कही- मैंने एक दिन राम का रूप धारण कर सीता के पास जाना चाहा। किंतु राम का रूप धारण करते ही मेरे हृदय से कलुषित भाव गायब हो गए।


रावण जैसा शक्तिशाली और अहंकारी राक्षस-राज का व्यक्तित्व भी जब राम का रूप धारण करने से कलुषित भावना से मुक्त हो सकता है तो रामभक्त राम का नाम लेने से किसी के प्रति घृणा या हिंसा के भाव से मुक्त क्यूं नहीं हो सकते?


कर्नाटक में जय श्री राम का नारा लगाकर जब कुछ लड़के हिजाब का विरोध कर रहे थे तो मुस्कान नामक लड़की ने प्रत्युत्तर में अल्लाह हू अकबर,अल्लाह हू अकबर चिल्लाना शुरू किया।


इस वीडियो की आड़ लेकर राम और अल्लाह में संघर्ष को बढ़ाने की साजिशें चल रही हैं। जबकि ज्ञानी कहते हैं कि दोनों वाक्य 'जय श्री राम' अथवा 'अल्लाह हू अकबर' यही घोषणा कर रहे हैं कि परम तत्व की जय हो क्योंकि वही महान है।


राम का नाम लेने वाला भी उसी मंदिर को पहुंचेगा जहां अल्लाह का नाम लेने वाला अपनी मंजिल पाकर रुकेगा। बात सिर्फ भाव-शुद्धि की है।


अब न राम का अवतरण होगा और न अल्लाह का पैगंबर ऊपर से उतर कर आएगा; अब तो सिर्फ इंसान के उर्ध्वगमन का रास्ता बचा है। इंसान यदि प्रेम और करुणा की शिक्षा के साथ आगे बढ़े तो वह पैगंबर भी बनेगा और अवतार भी।


उस शिक्षा के लिए सच्चा प्रयास ही सच्ची रामनवमी होगी क्योंकि कौशल्या माता की प्रेम की शिक्षा ने और विश्वामित्र तथा वशिष्ठ की सहिष्णुता की शिक्षा ने राम रूपी भगवान को जन्म दिया और कैकसी माता की महत्वाकांक्षा और अहंकार की शिक्षा ने रावण रूपी शैतान को।


अतः शिक्षा और शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण है। उसी भूमिका का निर्वाह करते हुए आनंद बक्शी ने 'हरे रामा हरे कृष्णा' फिल्म में यह गीत लिखा-


देखो रे दीवाने तुम यह काम ना करो


राम का नाम बदनाम ना करो।


राम ने हंसकर सब सुख त्यागे,


तुम सब दुख से डरकर भागे।


जीवन को नशे का तुम गुलाम ना करो,


राम का नाम बदनाम ना करो।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹


रामनवमी की शुभकामना