समरसता के लिए चाहिए अनेकांतवाद की दृष्टि
April 13, 2022संवाद
"समरसता के लिए चाहिए अनेकांतवाद की दृष्टि"
14 अप्रैल को भगवान महावीर का भी जन्म दिवस है और बाबासाहेब का भी। अनेकांतवाद की दृष्टि भगवान महावीर ने दी ताकि हम अहिंसक हों और हमारा दृष्टिकोण बहुत व्यापक हो ; भेदभाव को मिटाने हेतु संवैधानिक प्रावधान बाबासाहेब ने किया ताकि सामाजिक समरसता बनी रहे।
इसके बावजूद सामाजिक समरसता भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि हमारी दृष्टि व्यापक नहीं है।
सामाजिक समरसता को बढ़ाने के लिए राजनीतिक दृष्टि से जो भी कार्य किए जाते हैं,वे सतही होते हैं। मसलन उच्च जाति के नेता द्वारा नीची जाति के यहां जाकर भोजन ग्रहण कर लेना, विशेष अवसर पर दलितों के पैर धोना या उनकी पूजा करना। परिधि पर किए गए इन कार्यों से केंद्र पर की मूल दृष्टि नहीं बदल जाती है।
महावीर का अनेकांतवाद आमूलचूल दृष्टि परिवर्तन का सिद्धांत है। अनेकांतवाद के अनुसार किसी भी वस्तु के अनेक पक्ष होते हैं। किसी भी आंशिक-सत्य को संपूर्ण-सत्य मान लेना और उसे ही पूर्ण विश्वास के साथ जोरदार ढंग से व्यक्त करना हमें गलत दिशा की ओर ले जाता है। यदि गलत दिशा में आंख उठ जाए तो पांव जितना चलेंगे,वे मंजिल से दूर जाएंगे।
जाति के आधार पर ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र और धर्म के आधार पर हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई तथा राष्ट्र के नाम पर रूसी, यूक्रेनी,अमेरिकी, सीरियाई ; सब कामचलाउ लेबल हैं और आंशिक सत्य हैं। लेबल परिधि पर है और केंद्र पर इंसानियत है। यदि हमारा ऊपरी लेबल क्षीण होता जाए या कमजोर पड़ता जाए या फीका पड़ता जाए तो अंदर केंद्र में बैठा मूल आदमी की इंसानियत सबके भीतर एक है। दृष्टि यदि केंद्र पर स्थिर हो जाए तो समरसता लानी नहीं पड़ती है, अपने आप आ जाती है।
धार्मिक दृष्टि वाले संतों के जीवन में चारों तरफ समरसता ही समरसता है क्योंकि वे "ईशावास्यमिदम् सर्वम्" और "आत्मवत् सर्वभूतेषु" की धारणा पर चलते हैं। ऐसे लोगों के मन,वचन,कर्म में कहीं भी विरसता या हिंसा का लेशमात्र भी दर्शन नहीं हो सकता।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि वाले लोग ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र या हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई वाले सतही चमड़ी के रंग को गहरा से गहरा करते जाते हैं। परिधि पर के भेद को मजबूत करते जाते हैं और केंद्र पर के अभेद को भूलते जाते हैं। गर्व से कहो हम इस धर्म के हैं,गर्व से कहो हम इस जाति के हैं; का नारा दिन रात जपा जाता है और किसी विशेष एक दिन सामाजिक समरसता या अहिंसा का राग अलापा जाता है।
परिणामस्वरूप एक तरफ हम अनेक खंडों में बंटते जा रहे हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रीय-अखंडता का नारा जोरों से बुलंद करते जा रहे हैं।
"फिर रहा है आदमी भुला हुआ भटका हुआ
एक न एक लेबल हर एक माथे पे है लटका हुआ।
आखिर इंसान तंग सांचों में ढला जाता है क्यूं?
आदमी कहते हुए खुद को शरमाता है क्यूं??"
बाबासाहेब के नेतृत्व में संविधान विशेषज्ञों द्वारा बनाई गई सांविधानिक दृष्टि से किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है किंतु व्यावहारिक दृष्टि में भेदभाव बहुत बड़ी सच्चाई है।
महावीर की अनेकांतवाद की दृष्टि में कामचलाउ सत्य को पारमार्थिक सत्य समझ लेना ही हमारी भूल है। हमारी स्थिति उन अंधों की तरह हैं जो हाथी के पांव को या कान को या पूंछ को या सूंड़ को पकड़ कर उन अंगों को ही हाथी बताने लगते हैं। हमारा अंधापन जाए तो समग्र हाथी दिखाई दे।
अर्थात् ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र अथवा हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई का लेबल मिटे तो इंसान दिखाई दे ; फिर समरसता लानी नहीं पड़ती है,अपने आप आ जाती है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
महावीर-जयंती एवं बाबासाहेब जयंती की शुभकामना🙏🌹