संवाद


"नौजवान मांगे रोटी,कपड़ा और मकान


समान शिक्षा और सबको अवसर समान"


रामनवमी पर हुई हिंसा में लक्ष्मी गायब हो जाती है और शिवम वेंटिलेटर पर चला जाता है। बुलडोजर चलाकर मकान तोड़ दिए जाने पर इंसान की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह जाता है। हनुमान जयंती पर राजधानी पुलिस छावनी में बदल जाती है और हजारों किलोमीटर दूर रह रहे परिजनों के आंखों की नींद गायब हो जाती है और दिल का सुकून। आखिर विविधता में एकता का दर्शन विश्व को देने वाला भारत आज किधर जा रहा है?


जय हनुमान या अजान में आज का नौजवान उतना उत्सुक नहीं है, जितना रोटी,कपड़ा और मकान में। 'भूखे भजन न होई गोपाला, ले लो अपनी कंठी माला' -नौजवान को यह महसूस हो रहा है कि पढ़ने लिखने के बाद यदि कोई रोजगार नहीं मिला तो बढ़ती इस महंगाई के जमाने में वे घुट-घुट कर मर जाएंगे।


हर समय हिंदू और मुसलमान पर बहस का आयोजन किया जाता है,जिसमें राजनीतिक लोग सैकड़ों बातें बोलते हैं किंतु नई पीढ़ी के एक छोटे से प्रश्न के सामने उनकी सारी बातें फीकी पड़ जाती हैं। दिन रात होने वाली अनेक बहसों में हनुमान चालीसा के पक्ष में और अजान के पक्ष में विद्वतापूर्ण तर्क दिया जा रहा है किंतु एक विद्यार्थी का प्रश्न था- "हमें नौकरी हनुमान जी देंगे या अजान जी देंगे?" -सभा की सारी विद्वता मासूम के सवाल पर मूर्खता सी प्रतीत होने लगी।


दूसरे विद्यार्थी ने कहा कि पढ़ाई के समय हनुमान चालीसा हो या अजान ; यदि जोर से आवाज आती है तो हमारा समय बर्बाद होता है।


पढ़ने वाले नौजवान की समस्या हिंदू मुसलमान की समस्या नहीं है और न ही हनुमान या अजान की।


इन प्रतिभाओं के प्रश्नों को सुनकर मुझे अपने विद्यार्थी जीवन की याद ताजा हो आई। ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था तो दो रूम वाले फ्लैट में एक रूम पूजा को समर्पित था और वही मेरा अध्ययन-कक्ष भी था। सभी देवी-देवता की बारी-बारी से प्रत्येक सदस्य द्वारा घंटों पूजा चला करती थी और मंत्रोच्चार तथा भजन से मेरा पढ़ना मुश्किल हो जाता था। पूजा पाठ की प्रधानता के कारण मैं तो मन ही मन में पढ़ने को मजबूर था किंतु पूजा करने वाले अपनी आवाज कम करने को तैयार नहीं थे। एक तरफ मुझे अपने जीवन के बर्बाद होने का डर सता रहा था तो दूसरी तरफ भगवान के नाराज होने का क्योंकि पुजारी और भगवान दोनों के प्रति मेरे मन में नकारात्मक विचार उठने लगे थे।


ज्यादा सदस्यों वाले परिवार के पास आय का साधन सीमित होने के कारण इतना पैसा नहीं था कि मैं बाहर रूम लेकर पढ़ सकूं और धार्मिक आस्था वाले परिजनों के पास बिना पूजा किए रहने का सवाल ही नहीं था।


स्वामी विवेकानंद साहित्य में एक जगह पढ़ने को मिला कि रामकृष्ण परमहंस कहते थे- पूजा मने,वने,कोने में की जानी चाहिए ; अर्थात् परमात्मा की आराधना मन में, वन में या कोने में (यानी किसी एकांत में) किया जाना चाहिए ताकि दूसरे को पता ना चले। यह बात मैंने घर वालों को बताई और घरवाले इतने प्रेम से भरे हुए थे कि सबको समझ में भी आ गई।


पूजा का वातावरण रूम में होने के कारण मन पवित्र रहता था और अब शांति मिल जाने के कारण एकाग्र भी रहने लगा। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के सामने प्रेम के कारण झुक गई।फलत: जीवन संवरता चला गया। आज मैं जो कुछ हूं,अपने परिवार वालों और पढ़ने-वाले साथियों तथा पढ़ाने-वाले शिक्षकों के कारण हूं।


आज देश को निर्णय करना होगा कि नई पीढ़ी के सामने कितना झुकने को तैयार है। नई पीढ़ी न तो हिंदू, मुसलमान डिबेट(debate)के पक्ष में है और न ही अजान या हनुमान डिबेट के पक्ष में। वे तो एक समान शिक्षा के पक्ष में हैं जो इंसान बनाने के साथ रोटी,कपड़ा और मकान की व्यवस्था करने का हुनर दे सके।


किसी कवि के शब्दों में-


एक नया सूरज उगाओ आज अपने देश में


मेहनतों को दो सवेरा और थकन को शाम दो


जिंदगी खुद आदमी की आरजू करने लगे


इस सलीके से सदा हर काम को अंजाम दो।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹