संवाद


प्रश्न:- दंगा जितनी तेजी से फैलता है,उतनी तेजी से प्रेम क्यूं नहीं? क्या गांधी का रास्ता दुर्गम है?


प्रिय विद्यार्थी!


दंगा ढलान है। फिसलपट्टी पर से नीचे पहुंचने में समय नहीं लगता।


प्रेम आरोहण है। एक एक कदम साधकर ऊपर की ओर बढ़ाना पड़ता है।


घृणा,हिंसा के बीज मनुष्य के अंदर में मौजूद हैं तो प्रेम और अहिंसा के बीज भी। किंतु घृणा,हिंसा खरपतवार की तरह है। खरपतवार बिना खाद-पानी दिए भी उग आता है और तेजी से फैलता है। बार- बार उखाड़ो तो भी बार-बार उग आता है।


किंतु प्रेम गुलाब के फूल की तरह है जिसका बीज बोना पड़ता है और उसकी सुरक्षा करनी पड़ती है। खाद-पानी देना पड़ता है और जानवरों से भी बचाना पड़ता है। तब बहुत मुश्किल से प्रेम का पौधा बड़ा होता है।


इतनी तपस्या के बाद जब प्रेम का फूल खिल जाता है तो जीवन सुगंध से भर जाता है,आनंद से भर जाता है।


बिना किसी मेहनत के जो घृणा का खरपतवार अपने आप बढ़ जाता है तो जीवन दुर्गंध से भर जाता है, दुख से भर जाता है।


अतः दुरात्मा बहुत लोग मिल जाएंगे किंतु महात्मा बहुत दुर्लभ होते हैं।


लेकिन कोई भी अपनी पीढ़ी को महात्मा के रास्ते पर ही ले जाना चाहता है। चाहे कितना भी दुर्गम रास्ता हो और कितनी भी तपस्या करनी पड़े; फिर भी आत्मा जब महात्मा बनती है तो उसकी महिमा अद्भुत होती है।


अनगिनत लोग हुए और अनेक नेता हुए इसके बावजूद सदी के बाद भी महात्मा गांधी को दुनिया क्यों याद करती हैं?


क्योंकि उनका रास्ता कल्याण का रास्ता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत जब दंगों की आग में जल रहा था और चारों तरफ असत्य, घृणा और हिंसा का खरपतवार फैलता जा रहा था; उस समय में भी गांधी अपनी सत्य,प्रेम,अहिंसा का पुष्प लेकर नफरत के दुर्गंध से भरे क्षेत्रों में जा रहे थे।


स्वतंत्रता के जश्न में शामिल होने के लिए दिल्ली जाने की अपेक्षा वे दंगाग्रस्त नोआखली में दंगे की आग बुझाने के लिए प्रेम का गंगाजल छिड़क रहे थे। क्योंकि स्वतंत्रता से भी बड़ा मूल्य उनके लिए प्रेम और भाईचारे का था।


उनके प्रयास से दंगा रुका या नहीं ; यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि घृणा और हिंसा की जहां फसल काटी जा रही हो, वहां पर कोई आत्मा प्रेम और अहिंसा का बीज बोने का प्रयास कर रहा था।


इस प्रयास में उनके नश्वर शरीर को अपनों द्वारा ही गोली मार दी गई किंतु उनकी आत्मा महानता के शिखर पर आरूढ़ हो गई-


"जहां कहीं है ज्योति जगत में, जहां कहीं उजियाला


वहां खड़ा है कोई अंतिम मोल चुकाने वाला"


तभी तो उनके जन्मदिवस को यूएनओ द्वारा "विश्व अहिंसा दिवस" के रूप में मनाने का फैसला लिया गया। अभी भारत को विश्व गुरु बनाने का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह गांधी को दिया जाना चाहिए; क्योंकि विश्व के सभी देशों में गांधी के सत्य- प्रेम-अहिंसा पर शोध-कार्य चल रहा है और उनके बताए रास्ते पर आंदोलनों को सफल बनाया जा रहा हैं।


लेकिन बहुत बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने देश भारत में गांधी के कद को छोटा से छोटा करने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ लोग न तो उन्हें महात्मा मानने को तैयार हैं और न राष्ट्रपिता


इससे गांधी छोटे नहीं हो जाएंगे।किंतु असलियत यह है कि हम जैसे छोटे लोग एक साधारण से इंसान को महात्मा या राष्ट्रपिता बनता नहीं देख सकते।


हकीकत यह है कि गांधी ने स्वयं को महात्मा या राष्ट्रपिता नहीं कहा था। उन्हें महात्मा की उपाधि देने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता कविवर रवींद्रनाथ टैगोर थे और राष्ट्रपिता कहने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। कविवर टैगोर और नेताजी बोस गांधी की नीतियों से असहमत थे किंतु उनकी नीयत(intention) के सामने इन दोनों का सर झुक जाता था। मन,वचन,कर्म से सदैव एक रहने के कारण गांधी में आकर्षण इतना ज्यादा था कि उनके विरोधी भी उनके लिए अपने हृदय में सदैव ऊंचा स्थान रखते थे।


आज के नौजवानों को यह सोचना होगा कि वे गांधी के रास्ते पर चलकर अपनी आत्मा को ऊंचाइयों पर पहुंचाना चाहते हैं या दंगा भड़काने वालों के रास्ते पर चलकर नीचाईयों में गिरना चाहते हैं-


"पतन बहुत आसान मगर उत्थान कठिन है


ध्वंस बहुत ही सहज मगर निर्माण कठिन है।


समता और विषमता के कोलाहल में


अपने और पराए की पहचान कठिन है।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹