पुत्रो वा शत्रु: अहम् पृथिव्या:?
April 21, 2022संवाद
"पुत्रो वा शत्रु: अहम् पृथिव्या:?"
22 अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व पृथ्वी दिवस के संदर्भ में यह विचारणीय है कि जिन ऋषियों ने अपने आप को पृथ्वी का पुत्र कहा था- "पुत्रो अहम् पृथिव्या:" ; उन्होंने संबंधों को एक नई ऊंचाई दी थी।
मां पर बच्चा पूर्ण रूप से निर्भर रहता है किंतु मां के लिए वह भार नहीं है। इसके विपरीत ममता के कारण बच्चा मां के लिए ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है।
"धरती पर शिशु भूखा प्यासा आता है
ममता की छाती में दूध उतर जाता है।"
मां की तरह धरती-माता भी सभी प्रकार के जीवों के जीने हेतु अनिवार्य सुविधाएं जुटा देती हैं। किंतु बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि मां भी स्वस्थ रहे। इसी कारण से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2022 के लिए "हमारी पृथ्वी,हमारा स्वास्थ्य" को 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' की थीम के रूप में चुना।
लेकिन जिस धरती माता ने अन्न-जल, कंद-मूल,फल-फूल हमें सब कुछ दिया,उस धरती माता की छाती का लहू हम अब पीने लगे हैं। धरती के गर्भ में छिपे समस्त संसाधनों का जिस प्रकार से दोहन किया जा रहा है और युद्धों में जिस प्रकार से जान-माल तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है तथा हरी-भरी धरती को वीरान बनाया जा रहा है ; उसे देख कर ऐसा लगता है कि अब हम लहू मात्र पीने से संतुष्ट नहीं है बल्कि मां के मांस और हड्डियों को भी खा जाना चाहते हैं।
एक तरफ बढ़ती आबादी , दूसरी तरफ खत्म होते संसाधन, तीसरी तरफ गरीब अमीर के बीच की गहरी होती खाई और चौथी तरफ धर्म या राष्ट्र के नाम पर बढ़ते संघर्ष ने पृथ्वी को नर्क बना दिया है।
प्रज्ञावान ओशो कहते हैं कि यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। जिस प्रकार से विज्ञान ने पूरी पृथ्वी को एक कर दिया, उसी प्रकार से पूरी पृथ्वी का एक धर्म होना चाहिए और सभी राष्ट्रों को खत्म कर संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत एक शासन व्यवस्था होनी चाहिए।
लेकिन यह काम महत्वाकांक्षी-दृष्टि कभी नहीं कर सकती। इसके लिए तो ऋषियों की प्रेम-दृष्टि चाहिए,जिसका मूल मंत्र है- "पुत्रोअहम् पृथिव्या:".
फिर अपनी आवश्यकता से अधिक कोई पुत्र अपनी पृथ्वी-मां का दोहन नहीं कर सकता। गांधी जी यही कहा करते थे कि आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त है प्रकृति के पास लेकिन लालच की पूर्ति के लिए नहीं- "Enough for need but not for greed."
आज के लोभ और हिंसा को देखते हुए ऐसा लगता है कि "शत्रु: वयम् पृथिव्या:" अर्थात् हम पृथ्वी के शत्रु हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
विश्व पृथ्वी दिवस की शुभकामना🙏🌹