विद्यार्थी-चरित्र भी सबल बना विद्यासंबलवालों से
April 24, 2022संवाद
"विद्यार्थी-चरित्र भी सबल बना विद्यासंबलवालों से"
"विद्या संबल योजना" के असिस्टेंट प्रोफेसर्स को सत्र-पर्यंत पढ़ाने के बाद और परीक्षा-तिथि की घोषणा होने के बाद अब कार्यमुक्त किया जा रहा है। राजस्थान सरकार की इस दूरदर्शितापूर्ण योजना से सभी कॉलेजों में विषय-अध्यापक उपलब्ध हो गए। इससे कोरोना महामारी के कारण ठप्प पड़ गई शिक्षा को नई प्राण-ऊर्जा मिल गई।
मेरिट के आधार पर चुने गए मेधावी प्राध्यापकों ने तत्काल प्रभाव से अपनी कक्षाएं नियमित रूप से शुरू कर भारी संख्या में विद्यार्थियों को कॉलेज की ओर आकर्षित कर लिया। सूने पड़ गए कॉलेज गुलजार हो गए। पहली घंटी से लेकर अंतिम घंटी तक शिक्षण कार्य होने से कॉलेज में भी स्कूल का वातावरण निर्मित हो गया।
खासकर बांसवाड़ा जैसे दूरदराज के आदिवासी बहुल क्षेत्रों के अधिकांश विद्यार्थियों के पास मोबाइल सुविधा नहीं होने से वे ऑनलाइन टीचिंग का लाभ नहीं उठा पा रहे थे।पढ़ाई से दूर जा चुकी वैसी युवा पीढ़ी को मानो संजीवनी बूटी मिल गई। विशेषकर बालिकाएं जो घर में महामारी के कारण नजरबंद हो चुकी थीं और पढ़ाई से पूरी तरह कट चुकी थीं, उनको कॉलेज का वातावरण स्वर्ग सा प्रतीत होने लगा। क्योंकि एक तरफ वे अपनी क्लासमेट्स से घुलमिलकर अपने दुख-दर्द को बांट रही थीं तो दूसरी तरफ अंधेरे में रास्ता दिखाने वाले प्रकाश-स्तंभों के मिल जाने से उनकी पढ़ाई गति पकड़ रही थी।
लगभग सभी विषयों के पाठ्यक्रम कॉलेजों में पूर्ण कराने का यज्ञ इस सत्र में संपन्न हुआ। इस विद्यादान-यज्ञ में स्थायी प्रोफेसर्स के साथ अतिथि प्रोफेसर्स ने भी जो अपनी आहुति दी है, उससे विद्या को ही संबल नहीं मिला है बल्कि विद्यार्थियों का चरित्र भी सबल हुआ है।
'शिष्य-गुरु संवाद' के माध्यम से विद्यार्थियों से निकटता से जुड़े होने के नाते और विद्या संबल योजना के प्रभारी होने के नाते मुझे जो फीडबैक मिल रहे हैं, वे सरकार और समाज के लिए बहुत काम के हैं। विद्यार्थी दिल ही दिल में एक ही बात कर रहे हैं-
"रास्ता दिखानेवाले फिर किस राह पे मिलेंगे?
हम तो हर मोड़ पे उन्हीं की राह तकेंगे।।"
तन का जन्म मां- बाप से होता है किंतु मन का जन्म शिक्षक से होता है। अतः हमारी संस्कृति में "द्विज" शब्द का बहुत महत्व है, जिसका अर्थ होता है दुबारा जन्म। शिक्षक ही दोबारा जन्म देने में समर्थ होता है जिसके कारण "मन"आत्मा की ओर गति करने लगता है।
यही मन भटककर नीचे की ओर गति करने लगता है तो समाजकंटकों का जन्म होता है जो अपने अपराधों से सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करते हैं।
किंतु शिक्षक के संपर्क में आने से यह मन सुमन बन जाता है फिर इसके सुगंध से वातावरण सुवासित हो जाता है। सुमन सृजनशील होता है और शांति-व्यवस्था को बढ़ाने वाला होता है। 'राष्ट्र कल कहां जाएगा' इसका निर्धारण क्लास में दी जाने वाली शिक्षा करती हैं और पढ़ाने वाले शिक्षक करते हैं।
अतः जर्जर हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को संकटकाल में संबल देने वाले इन शिक्षकों के विदाई काल में मेरा हृदय उनकी कर्तव्यनिष्ठा और योग्यता के कारण उनके प्रति आदर और प्रेम से भरा हुआ है। सरकारी व्यवस्था के कारण एक समय विशेष के बाद वे कॉलेज में हमारे साथ काम करते हुए नहीं दिखेंगे किंतु विद्यार्थियों और सहकर्मियों के दिलों में उन्होंने जो जगह बनाई हैं, वहां पर वे सदैव विराजमान रहेंगे।
विद्यार्थी और अभिभावक के साथ समाज को भी चाहिए कि वे शिक्षक की और क्लास की महत्ता को समझें। शिक्षक और क्लास-टीचिंग से विद्यार्थियों का ज्ञानवर्धन ही नहीं होता है बल्कि चरित्र-संवर्धन भी होता है। सरकार से भी अपेक्षा है कि कॉलेजों में सभी विषयों के शिक्षकों को जल्द से जल्द नए सत्र शुरू होने से पूर्व उपलब्ध कराएगी जिससे नई पीढ़ी अपने व्यक्तित्व को नई ऊंचाइयां दे पाएगी।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
विद्या संबल साथियों को शुभकामना और धन्यवाद 🙏🌹