सत्य की खोज ही ब्राह्मणत्व
May 1, 2022संवाद
"सत्य की खोज ही ब्राह्मणत्व"
परशुराम जयंती और शंकराचार्य जयंती की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं,यह बहुत खुशी की बात है किंतु एक विशेष वर्ग (तथाकथित ब्राह्मण)ही इसमें संलग्न है जो बहुत ही अफसोस की बात है।
अहंकार का नाश करने वाले परशुराम और अद्वैत की स्थापना करने वाले शंकर क्या संपूर्ण मानव जाति के आदर्श नहीं हो सकते हैं?
विराट और व्यापक व्यक्तित्व वाले महापुरुषों को हमने क्षुद्र और संकीर्ण कैदखानों में कैद कर लिया।
जिस जमाने में ब्राह्मणवाद की आलोचना आधुनिक शिक्षा की मुख्यधारा बन गई हो, उस जमाने में ब्राह्मणत्व की बात करना खतरे से खाली नहीं है। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब तथाकथित ब्राह्मण घर में जन्म लेकर कोई ब्राह्मणत्व की बात करे।
लेकिन स्वामी विवेकानंद जो स्वयं ब्राह्मणवाद के सबसे प्रखर आलोचक थे, उनको भी कहना पड़ा कि इस सनातन संस्कृति का आदर्श ब्राह्मणत्व ही है, जिसे मन-वचन-कर्म से उपलब्ध किया जा सके तो मनुष्यत्व देवत्व को प्राप्त कर लेता है।
"आखिर यह ब्राह्मणत्व है क्या?"
जब ब्राह्मण घर में जन्मे रामकृष्ण परमहंस को गैर- ब्राह्मण घर में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त में सत्य की चिंगारी दिखाई पड़ जाती है और उसे वे अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियां देकर अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाते हैं तो यह ब्राह्मणत्व है।
जब कई लोगों से संबंध रखने वाली मां अपने पुत्र को सत्य बता देती है तथा उस सत्य को गुरु के सामने वह पुत्र ज्यों का त्यों प्रकट कर देता है; और गुरु गौतम ऋषि उसे परम प्रिय शिष्य के रूप में ग्रहण कर सत्यकाम जाबाल नाम देते हैं तथा ब्रह्म-ज्ञान देते हैं तो यह ब्राह्मणत्व है।
आज किसी आविष्कार के उपयोग करने के पूर्व उस आविष्कार को करने वाले वैज्ञानिक की कोई जाति नहीं पूछता तो फिर किसी उत्तम विचार का उपयोग करने के पूर्व उस विचार को देने वाले विचारक की जाति क्यों पूछी जाती हैं?
यदि उपयोगी-आविष्कार को देने वाला वैज्ञानिक सबका हो सकता है तो उपयोगी-विचार को देने वाला विचारक सबका क्यों नहीं हो सकता?
उस विचारक या पथप्रदर्शक को जाति,धर्म,क्षेत्र,लिंग भाषा के दायरे में सीमित कर देना उसके ब्राह्मणत्व अर्थात् विराटता को सीमित बनाने का क्या प्रयास अथवा षड्यंत्र नहीं है?
पौराणिक पात्र परशुराम एक प्रतीक है जिन्होंने अहंकारी सत्ता को अपने सत्यज्ञान रूपी परशु से कई बार नष्ट कर डाला और शंकर तो एक ऐतिहासिक पात्र हैं जिन्होंने अपने अकाट्य तर्क से अन्य सभी विचारों को काटकर अद्वैत-वेदांत की स्थापना की। ये दोनों उदाहरण बाह्य और आंतरिक संघर्षों में सत्य को खोजने और स्थापित करने का प्रेरणास्पद प्रयास है।
वैज्ञानिक पदार्थ जगत में परम तत्व की खोज कर रहा है और अपने पिछले खोज से सबक लेते हुए सत्य की ओर आगे बढ़ रहा है। ब्राह्मण भी परमात्म-जगत में खोज कर रहा है जिस परम सत्य तक गीता, कुरान,बाइबल, गुरुग्रंथ इत्यादि अनेक माध्यमों से पहुंचा जा सकता है।
वैज्ञानिक तो अपने पूर्ववर्तियों की सभी खोजों का सीढ़ियों की तरह उपयोग कर लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, इसी कारण से सर्वग्राह्य बन जाते हैं। किंतु तथाकथित धार्मिक ऐसा नहीं कर पाते और संप्रदायों के सख्त सांचे बना लेते हैं। और संप्रदायों में भी जाति के छोटे-छोटे घर बनाकर आपस में लड़ते-झगड़ते हैं।
परशुराम जब क्षत्रिय विरोधी होकर भी क्षत्रिय कुल में जन्मे राम के सामने में उनके परम स्वरूप को जानकर समर्पण कर सकते हैं और शंकर तर्क की चरम ऊंचाई पर पहुंचकर अद्वैत वेदांत की स्थापना के बाद जब 'भज गोविंदम् मूढमते' द्वारा भक्ति की परम गहराई को पा सकते हैं तो हम क्यों नहीं?
हिंदू,मुस्लिम, सिख,इसाई जो विभिन्न रास्तों से उसी एक परम सत्य को खोजने का प्रयास करते हैं तो एक दूसरे के प्रति सद्भावना क्यों नहीं रख सकते?-
"ये हिंदू है,वो मुसलमान,ये मसीही , वो यहूद
इस पर ये पाबन्दियां और उस पर वो कयूद
शैखो पंडित ने क्या अहमक बनाया है हमें
छोटे-छोटे तंगखानों में बिठाया है हमें।।"
ब्राह्मणत्व की चरम घोषणा है कि "एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति" अर्थात् सत्य एक है जिसे जानने वालों द्वारा भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है।
इस पुकार के नाम पर या लेबल के नाम पर जो व्यावहारिक सत्य को ही पकड़ कर बैठ गए हैं और आपस में संघर्षरत हैं, उन्हें पारमार्थिक सत्य "सब में तेरा रूप समाया,कौन है अपना कौन पराया" की ओर बढ़ना होगा, तभी संघर्ष मिटेगा और शांति उपलब्ध होगी-यही ब्राह्मणत्व है।
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि किसान का खेत हो या खिलाड़ी के खेल का मैदान,वैज्ञानिक की प्रयोगशाला हो या साधु का मंदिर उस परम सत्य तक पहुंचने के सभी प्रमाणिक रास्ते हैं और अपने-अपने रास्ते की साधना कर मंजिल प्राप्त कर लेना ही ब्राह्मणत्व है।
स्वामी जी की इस परिभाषा से महामारी के काल में टीका विकसित करने वाले वैज्ञानिक , अपनी जान की बाजी लगाकर कोरोना पीड़ितों की सेवा करने वाले डॉक्टर ,व्यापक और वैज्ञानिक सोच को विकसित करने वाले शिक्षक सभी में ब्राह्मणत्व है जो "ईशावास्यमिदं सर्वम्" की भावना रखते हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
पवित्र दिवस पर पवित्र आत्माओं की ऊर्जा सबको 'ब्राह्मणत्व' की ओर ले जाए इसी शुभकामना के साथ🙏🌹