परशु(शक्ति)+राम(शांति)= "परशुराम" अर्थात् जिसकी शक्ति अहंकार को बार-बार नष्ट कर शांति की स्थापना के लिए होती है : ब्राम्हण घर में जन्म ले लेने मात्र से मैं ब्राह्मण नहीं हो गया। "जन्मना जायते शूद्र:" अर्थात् जन्म से हर कोई शूद्र पैदा होता है, 'ब्राह्मण' होना तो सबसे बड़ी उपलब्धि है जो संकल्प ,साहस श्रम और श्रद्धा से पाया जाता है। "ब्राम्हण" का अर्थ होता है जो फैलता जाए, बढ़ता जाए और विराट होता जाए। शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर,साहित्यकार, कलाकार और सृजनकार जब अपने ज्ञान के बल पर कोई ऐसा सृजन करते हैं, जिससे समस्त ब्रह्मांड का कल्याण होता है तो वे ब्राम्हण कहलाने के अधिकारी हैं। किसी का भी गुण और कर्म जब "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" की कसौटी पर खरा उतरता हो तो वह ब्राह्मण हो गया। "ब्राह्मणवाद" की सबसे कड़ी आलोचना करने वाले स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि भारत में जन्म हो जाने मात्र से हर किसी की आत्मा भारत की नहीं हो जाती और ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मात्र से कोई ब्राम्हण नहीं हो जाता क्योंकि भारत एक देश ही नहीं बल्कि एक संदेश है-" वह संदेश है यह कि सत्पथ पर चाहे कट जाओ, पर कुपंथ पर कभी जीत के लिए न पांव बढ़ाओ" -उसी प्रकार से ब्राम्हण कोई जाति नहीं बल्कि एक मनोवृति है जो "सत्यं शिवं सुंदरं" की खोज में अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है। ज्ञान के लिए कठोरतम त्याग-तपस्या करने वाले लोग जब आज विषयों में लीन हो गए हैं ,तो उन्हें ब्राह्मण कैसे कहा जाए?-" सोचिअ विप्र जो वेदविहीना,तजि निज धर्म विषय लय लीना "- तुलसीदास के अनुसार तो वह ब्राम्हण शोक के योग्य है ,जो ज्ञान के मार्ग को छोड़कर विषय-वासनाओं में लीन हो गया है।परशुराम भगवान तो एक प्रतीक हैं जो शास्त्र और शस्त्र दोनों के ज्ञान में समान रूप से निपुण थे और जिन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग अहंकार के प्रतीक राजाओं का कई बार सर्वनाश करने में किया ताकि शांति स्थापित हो सके। मेरी दृष्टि में आधुनिक समय में इसका अर्थ है कि एटमी-ऊर्जा की खोज करने वाला कोई ब्राह्मण था किंतु उस सिद्धांत से एटम बम बनाकर उसे हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराकर सर्वनाश करने वाला कोई अहंकारी मनोवृति का था ;तो आज का "परशुराम"शक्ति के ऐसे दुरुपयोग को रोकने की सामर्थ्य वाला होगा।- "शिष्य-गुरु संवाद"से डॉ सर्वजीत दुबे परशुराम जयंती की शुभकामनाओं के साथ 🙏🌹