संवाद


"पर्व और पुलिस"


पापा! और सब दिन तो ऑफिस से लेट आते ही हो, किंतु पर्व से एक दिन पहले तो जल्दी आ जाओ। कल खुशी का त्यौहार है, उसकी तैयारी करेंगे और पर्व पर खूब खुशियां मनाएंगे। छोटी बच्ची का फोन पाकर पापा की खुशी का ठिकाना न रहा। अपने वश में रहता तो तुरंत चल देते, लेकिन यह तो पर्व का दिन आने वाला है, इस पर तो बॉस का भी वश नहीं चलता कि वह छुट्टी दे दे।क्योंकि उसे भी छुट्टी मिलने वाली नहीं है। जो सभी के लिए खुशी का समय होता है वह पुलिस वालों के लिए तो सबसे अधिक तनाव का समय होता है। अपनी मजबूरियों को छुपाते हुए पिता ने कहा कि तुम मम्मा के संग त्योहार मना लो और खूब खुश हो लो। मुझे तो छुट्टी नहीं मिलने वाली है।


मन ही मन में पुलिस वाले ने कहा कि शायद तुम्हारी खुशी से मेरे जीवन का तनाव कुछ हल्का हो जाए।


लेकिन छोटी बच्ची ने दोबारा फोन लगा कर पापा को कहा कि हमारे तो स्कूल में छुट्टी है, फिर आपका कैसा स्कूल है कि जहां पर्व मनाने के लिए भी छुट्टी नहीं दी जाती।


पापा ने कहा कि प्यारी बच्ची! पुलिस का स्कूल ऐसा है कि यहां पर अपने बच्चे से बात करने के लिए भी ज्यादा समय नहीं बचता है। बड़ी हो जाने पर तुमको समझ में आ जाएगा कि खुशी का त्योहार भी हम पुलिस वालों के लिए कितना भारी मुसीबत का अवसर बनकर आता है।


छोटी बच्ची के दिमाग में यह बात समझ ही नहीं आ रही थी कि प्रेम और खुशी के त्यौहार पर पुलिस का क्या काम? लड़ाई-झगड़े के अवसर पर तो पुलिस की जरूरत समझ पड़ती है किंतु पूजा,प्रार्थना के अवसर पर तो पुलिस की जरूरत समझ ही नहीं पड़ती।


निर्दोष बच्ची को जो बात समझ में नहीं आ रही है,वह आज किसी भी संवेदनशील हृदय को समझ में नहीं आ रही है। पर्व का दिन तो दिव्य-आत्माओं का दिन होता है और उस पवित्र मुहूर्त में सभी का हृदय पवित्रता और प्रेम से भरा होना चाहिए; उसमें लड़ाई झगड़ा क्यूं?


मन सिर्फ खुश होना ही नहीं चाहता है, बल्कि उस खुशी को सार्वजनिक रूप से सबके साथ बांटना भी चाहता है; इसीलिए तो पर्व-त्यौहार अस्तित्व में आए।


किंतु खुश होना और खुशी को सार्वजनिक रूप से सभी के साथ प्रकट करने की कला से हम दूर होते जा रहे हैं; तभी तो "अक्षय" जैसा शुभ मुहूर्त भी 'क्षय' का कारण बन जाता है और ईद मुहर्रम में तब्दील हो जाती है। अपने-अपने पर्व के उमंग को अब दूसरों के रंग में भंग डालने का जरिया बनाया जा रहा है।


इसमें सबसे ज्यादा मुसीबत पुलिसवालों की हो रही हैं। यदि पर्व की शोभायात्रा को इजाजत नहीं देते हैं तो हृदयहीनता की पराकाष्ठा होती है और इजाजत दे देते हैं तो टकराव की संभावना होती है। शोभायात्रा अशोभन-यात्रा बन जाती है।


अपनी खुशी के इजहार के अवसर को छोड़कर दूसरों की खुशी के इजहार को सुरक्षा देने के लिए लगाई गई पुलिस ही पत्थरबाजी और गोलीबारी का शिकार हो जाती हैं। फिर दंगा कराने वालों और आग लगाने वालों पर कार्रवाई के प्रसंग में पुलिस पक्षपात के आरोपों से घिर जाती हैं। इस प्रकार से त्यौहार के पहले का समय, त्यौहार के दिन का समय और त्यौहार के बाद का समय पुलिस वालों के लिए इतना खतरनाक हो गया है कि वे पर्व और त्यौहार शब्द से ही तनाव में आ जा रहे हैं।


पुलिस का धर्म क्या होता है,यह तो सवालों के घेरे में हैं किंतु नागरिक धर्म क्या होता है, यह सवाल कब हमारे दिमाग में आएगा?


पुलिस को क्लीन चिट देने का कोई इरादा नहीं है किंतु प्रत्येक नागरिक को यह तो समझना ही पड़ेगा कि किन परिस्थितियों और किन मानसिक-स्थितियों में पुलिस काम करती हैं। हमें तो खुशी भी मनाने का सलीका नहीं आए और फ्रस्ट्रेटेड पुलिस से अपेक्षा है कि हम पर फूल बरसाए; क्या यह संभव है?


कविवर हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में-


"कोई नहीं समय सीमा है, कोई नहीं ठिकाना है


जहां जहां भी पड़े जरूरत, वहां वहां भी जाना है।


दिन को ड्यूटी,रात को पहरा; एक रात तो करके देखो


बिना पुलिस के चलकर देखो।।


ये भी लाल लाडले मां के, इनके भी परिवार रहे


होली ईद दशहरा पर भी इनके आंसू रोज बहे।


बात अगर हो लाख टके की, इनकी पीड़ा मिलकर देखो।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


अक्षय तृतीया,परशुराम जयंती और ईद की शुभकामनाएं🙏🌹