संवाद


"शंकर-दर्शन की प्रासंगिकता"


परम तत्त्व के पास जाकर भी पवित्र स्थानों में धन-पद जैसे जागतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थनाएं की जाती हैं।धन और पद के पीछे पागल जगत को देखकर हमें यही लगता है कि जगत ही सत्य है।


किंतु शंकर ने "ब्रह्म सत्यम् , जगत् मिथ्या" कहा। आज यह समझना बहुत मुश्किल है कि "ब्रह्म /चेतना/आत्मा" जो दिखाई नहीं देती है , उसको सच कैसे माना जाए और संसार जो खुली आंखों से दिखाई दे रहा है , उसको मिथ्या कैसे माना जाए?


जिस जमाने में सत्ता के लिए तथाकथित बड़ों के द्वारा भी सब कुछ दांव पर लगा दिया जाता है, उस जमाने में शंकर के 'ब्रह्म सत्यम्' वाले अद्वैत दर्शन को समझना आसान नहीं है। लेकिन यदि शंकर को हम नहीं समझ पाते हैं तो इससे शंकर गलत नहीं हो जाते हैं।


भारत ने एक ऐसी भी ऊंचाई चूमी थी कि कम उम्र का बालक शंकर संन्यासी हो जाता था और इस जीवन के उस पार तक जाने वाले अलौकिक तत्त्व को देख पाता था। आज का बूढ़ा व्यक्ति भी सत्ता से ऐसे चिपक जाता है जैसे गुड़ से चींटा। जबकि बुद्ध,महावीर युवावस्था में सत्ता को छोड़कर सत्य की खोज में निकल गए थे।


जगत को मिथ्या कहने के बावजूद भी चारों दिशाओं में शंकराचार्य ने पीठों की स्थापना की। उद्देश्य यह था कि अद्वैत दर्शन का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि दुर्लभ मानव जीवन नश्वर चीजों के पीछे ही समाप्त न हो जाए। अनश्वर आत्मा को प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त कर सके। क्योंकि आत्मा के दर्शन होते ही सभी में वही एक दिखाई देने लगता है।


खुली आंखों से नहीं दिखाई देने वाला कोरोना जैसा वायरस जब पूरे जगत को समस्या में डाल सकता है तो खुली आंखों से नहीं दिखाई देने वाला ब्रह्म या आत्मा सत्य-समाधान क्यों नहीं हो सकता है?


शंकराचार्य ने अपने विवेक रूपी तीसरे नेत्र से उस ब्रह्म या आत्मा को सत्य पाया। आज शंकराचार्य की प्रासंगिकता यही है कि हम भी उस विवेक रूपी तीसरे नेत्र को जगाने का प्रयास करें। यह जीवन और जगत साधन है और आत्म-साक्षात्कार साध्य , यही शंकर दर्शन का मूल मंतव्य है-


"देना है तो निगाह को ऐसी रसाई दे


मैं देखूं आईना तो मुझे तू दिखाई दे।"


कहां तो चर अचर समस्त जगत में ब्रह्म-चेतना को देखने के लिए शंकर ने एक प्रक्रिया दी और कहां हम ऐसे अभागे हैं कि इंसानों में भी हिंदू ,मुसलमान देखने लगे हैं और अजान तथा हनुमान में विवाद पैदा कर देते हैं।


ब्रह्म का अर्थ होता है फैलना- अपने आप को व्यापक बनाते जाना ; क्योंकि सभी आत्मा में उसी परमात्मा का अंश है; और वही सत्य है‌। नित्य परिवर्तनशील इस अनित्य जगत में मृत्यु के पार ले जाने वाला अमृत सूत्र-"ब्रह्म अर्थात् चेतना ही सत्य है" को आज विज्ञान का भी समर्थन प्राप्त होने लगा है।


इस सूत्र को व्यवहार में उतारने वाले का जीवन निश्चितरुपेण विराट होगा, वह क्षुद्र में उलझा हुआ नहीं रह सकता, परंतु दुर्भाग्य है कि-


"रही चेतना बनी अहिल्या, जागी नहीं अभागी


जानबूझकर बधिर बन गया अनहद का अनुरागी।‌।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


शंकराचार्य जयंती की शुभकामना🙏🌹