संवाद


"कुलपति और घूस?!"


कुलपति और घूस?!-असंभव। कुछ चीजें अपनी कल्पना में भी नहीं आ पाती। क्योंकि कल्पना भी अपने अनुभव के आधार से ही निकलती है। अपने सीनियर्स का ही मेरा अनुभव इतना अद्भुत रहा है कि जीवन का दुर्भाग्य सौभाग्य में तब्दील हो गया। बल्ला पकड़ने वाला हाथ कलम पकड़ना सीख गया और चलाना भी।


पटना विश्वविद्यालय का स्टूडेंट होने पर ऐसे-ऐसे शिक्षकों को देखने का मौका मिला जो ज्ञान के चलते- फिरते प्रकाश स्तंभ थे। उनके बारे में सुनकर और सोच कर अलौकिक अनुभूति होती थी।


कुलपति के बारे में तो कहना ही क्या! उनके आवास के पास से भी गुजरता था तो लगता था कि पवित्र हवाएं कुछ कह रही हैं। अपना कुल अर्थात् शिक्षा जगत किस प्रकार से आगे बढ़े, इसी चिंतन में कुलपति आकंठ डूबे रहते थे।


चर्चा में सुनता था कि गरीब किसान परिवार का वशिष्ठ नारायण साइंस कॉलेज(PU)में प्रथम वर्ष के एक क्लास के दौरान प्रोफेसर से नहीं हल होने वाले sums (सवाल) को एक से अधिक प्रकार से हल कर दिया तो प्रोफ़ेसर उसे कुलपति के पास लेकर गए। तत्कालीन कुलपति जी ने उस प्रतिभा को पहचाना और अमेरिका के नासा इंस्टिट्यूट से आए हुए प्रोफेसर हेली के सामने में प्रस्तुत किया। कुलपति और प्रोफेसर हेली के सहयोग से वह वशिष्ठ नारायण सिंह नासा के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अपने अमूल्य योगदान से सभी को आश्चर्य में डाल दिया। उन डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह की गणना आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ के साथ की जाती हैं। जिस प्रतिभा को कुलपति ने उड़ने के लिए आकाश दिया,वही प्रतिभा सरकार और समाज की उपेक्षा के कारण पागल हो कर मरी।


मेरा तात्पर्य है कि शिक्षा जगत और उसका कुलगुरू (वाइस चांसलर)कोयले में हीरे बनने की छिपी संभावना को देख लेता है और उसे तराश कर डायमंड बना भी देता है।


राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति के भी बारे में यह पढ़ने को मिला कि अपने विश्वविद्यालय को शीर्ष पर पहुंचाने के लिए देश और विदेश में घूम-घूम कर उन्होंने अच्छे शिक्षकों की तलाश ही नहीं की बल्कि उन्हें अपने यहां लाए भी। उनके ऐसे कार्यों से राजस्थान विश्वविद्यालय की गणना शीर्ष के प्रतिष्ठित संस्थानों में होने लगी।


गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय जब उदयपुर से बांसवाड़ा में आया तो तत्कालीन कुलपति ने अकादमिक प्रभारी के रूप में मुझे यहां के प्रतिभाओं के विकास के लिए कार्य- योजना बनाने को कहा। और विचार विमर्श के बाद विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति को अच्छा करने के लिए अभिव्यक्ति-क्लास और विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए शाम के समय में कोचिंग शुरु करने को कहा।


वर्तमान कुलपति जी ने भी बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा को देखते हुए प्रत्येक शिक्षा संस्थान में गांधी कॉर्नर की स्थापना का आह्वान किया।


अपने जीवन के इन अनुभवों की पृष्ठभूमि में जब एक कुलपति के द्वारा ₹5लाख की घूस लेते पकड़े जाने की खबर समाचारपत्र के प्रथम पृष्ठ पर देखा और पढ़ा तो सन्न रह गया।


कुलपतियों ने तो अपनी पत्नियों के जेवर तक शिक्षा संस्थान के विकास के लिए लगा दिए हैं।


गुरुवर वरतंतु ने अपने निर्धन शिष्य कौत्स को सारी विद्या सिखा दी किंतु कौत्स के पास गुरु-दक्षिणा में देने हेतु कुछ नहीं था। गुरुवर वरतंतु ने कहा कि तुमने मेरी सारी विद्या सीख ली और इसे जाकर अब समाज में बांटो, इससे बड़ी गुरु दक्षिणा मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकती।


ऐसे कुलगुरू प्राचीन भारत में ही थे,ऐसी बात नहीं। मेरे साथ के अनेक लोगों का निजी अनुभव गुरु और कुलगुरु के बारे में पके हुए फल से लदे हुए वृक्ष के समान रहा है, जो अपने ज्ञान रूपी फल-फूल को बांटकर ही तृप्ति पाते थे-


"किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते हैं


गिरने से पहले उसको वे क्यों रोक नहीं लेते हैं?"


दिनकर जी पूछते हैं कि पके फल से लदे एक वृक्ष के लिए देने के अलावा और क्या कोई चारा बचता है?


एक समय था जब शिक्षा जगत में वे ही लोग प्रवेश पाते थे जिनके लिए ज्ञान से बड़ा धन और कुछ नहीं होता था। ऐसे शिक्षाविदों के बीच से जब कोई अपने ज्ञान और योग्यता के आधार पर कुलपति बनता था तो विश्वविद्यालय का पूरा माहौल शैक्षिक हो जाता था,जहां ज्ञान और चरित्र को ऊंचाइयों पर पहुंचाने का यज्ञ अहर्निश चलता रहता था।


जब से शिक्षा का व्यवसायीकरण लक्ष्मण-रेखा को पार कर गया तथा कुलपतियों की नियुक्ति भी व्यावसायिक बुद्धि से की जाने लगी तब से सरस्वती पुत्रों की आसक्ति लक्ष्मी में ज्यादा बढ़ने लगी।


अब तो कई वट वृक्षों के नाम विवादों में आ रहे हैं, किंतु किसी कुलपति का घूस लेते रंगे हाथों पकड़े जाने का यह पहला मामला मेरी नजरों के सामने आया है,जिन्हें पढ़-सुनकर ऐसा लगता है कि मानो द्रौपदी के चीर हरण की कहानी लिखते समय किसी ने गलती से दुशासन की जगह कुलगुरू कृपाचार्य का नाम लिख दिया हो।


कुछ विभागों की मैली चादरों पर जब भ्रष्टाचार के छींटे पड़ते हैं तो आश्चर्य नहीं होता है क्योंकि वहां धन की पूजा थोड़ी बहुत हमेशा चलती रहती थी। किंतु साफ-सुथरे धवल वस्त्र पर जब एक भी छींटा पड़ता है तो चादर नहीं दिखाई पड़ता है; बल्कि छींटा ही दिखाई पड़ने लगता है। जब गंगोत्री ही काली हो जाएगी तो इलाहाबाद तक पहुंचते-पहुंचते गंगा कैसी रह जाएगी?


नई पीढ़ी का भविष्य शिक्षा जगत निर्धारित करता है और शिक्षा जगत का भविष्य "कुलपति" -


"उजालों के रहते ये अंधेरा कैसा?


जीवन में होगा फिर सवेरा कैसा??"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹