आजादी के अमृत मुद्दे
May 10, 2022संवाद
"आजादी के अमृत मुद्दे"
10 मई को विदेशी शासन के खिलाफ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष हुआ था। 1857 की क्रांति में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। भारतीय एकता से डरकर ब्रिटिश राज ने "फूट डालो और राज करो" की नीति पर काम करना शुरू किया। वैसे हर एक मुद्दे को विदेशियों द्वारा हवा देना शुरू किया गया जिससे देश की एकता खंडित होती हो।
विभाजनकारी विष भरे मुद्दों का परिणाम हमने देखा लेकिन क्या कुछ सीखा भी?
आजादी का अमृत महोत्सव हम मना रहे हैं किंतु जिन मुद्दों पर हम चर्चा कर रहे हैं, क्या वे अमृत-मुद्दे हैं?
बचपन से ही यह सुनते और पढ़ते आए हैं कि जैसा सोचोगे वैसा बनोगे। आज देश की सोच में क्या चल रहा है? जब कभी टीवी खोलो या समाचारपत्र ; हिंदू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, लाउडस्पीकर बुलडोजर, अजान हनुमान के मुद्दे ही सुनाई पड़ रहे हैं या दिखाई दे रहे हैं।
भारतीय राजनीति में गांधी इसलिए छा गए कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे जन सरोकार के तथा वास्तविकता के धरातल से जुड़े मुद्दे थे और एक दूसरे को जोड़ने वाले मुद्दे थे। गांधी महात्मा इसलिए बने क्योंकि वे दो मोर्चों पर लड़ रहे थे-एकता के लिए भी और स्वतंत्रता के लिए भी; आंतरिक शत्रुओं से भी और बाहरी शत्रुओं से भी।
आज जिन मिथ्या मुद्दों में भारत उलझा हुआ है, उससे "फूट डालो और राज करो" की नीति ही आगे बढ़ती हैं। ऐसी बहसों को सुनने के बाद मन बहुत विषाद से भर जाता है क्योंकि हमें इंसान दिखाई देना बंद हो जाता है। "वसुधैव कुटुंबकम्" की सोच रखने वाले भारत को यह क्या हो गया?
हर टीवी चैनल पर मिथ्यार्थियों के विवाद को देखते-देखते जब मैं खिन्न हो चुका था और सर दर्द से परेशान होता जा रहा था तो अचानक एक चैनल पर "कैलाश सत्यार्थी" जी दिखाई पड़े और उनको सुनने लगा तो मेरी शिरोवेदना जाती रही और आशा की एक किरण दिखाई देने लगी।
मिथ्यार्थी लोगों की इस दुनिया के बीच "सत्यार्थी जी" की एक दुनिया भी हैं जो "बचपन बचाओ आंदोलन" चलाकर विश्व के 144 देशों में अब तक 90000 से अधिक बच्चों और बच्चियों को बाल श्रम और यौन शोषण से छुड़ाकर शिक्षा की रोशनी में लाए हैं। जान की बाजी लगाकर बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए ये बच्चे और बच्चियां आज उनके मिशन को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं।
उनके कार्यों से प्रेरणा लेकर दूरदराज के क्षेत्रों में कई लोग इस महा अभियान से जुड़ कर अपना जीवन धन्य बना रहे हैं। बचपन को बचाते समय उन बच्चे और बच्चियों में उन्हें हिंदू मुसलमान दिखाई नहीं देता बल्कि भारत का भविष्य दिखाई देता हैं।
कैलाश जी का कहना है कि आज भारत की 40% आबादी 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की हैं जिन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इनमें से बहुत सारे बाल श्रम और यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं। सरकार कुल जीडीपी का 4% भी भारत के नौनिहालों के लिए खर्च नहीं करती।
नोबेल पुरस्कार विजेता की पीड़ा यह है कि हमारा देश ऐसे "सत्य और तथ्य वाले मुद्दे" पर कब सोचना शुरू करेगा।
हम बचपन पर बात नहीं करेंगे , जवान पर चर्चा नहीं करेंगे, किसान पर कोई सर्वसम्मत कानून नहीं बनाएंगे और वैज्ञानिक सोच को आगे नहीं बढ़ाएंगे तो हमारा देश महान कैसे बन सकेगा?
विवादास्पद व विभाजनकारी कमेंट को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने वाला मीडिया प्रेरणास्पद व सृजनकारी काम को बार-बार दिखाए और उस पर चर्चा कराए तो राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय सोच बदल सकती हैं।
जिंदा उदाहरण हमारे बीच में हैं। उदयपुर की दुल्हन डिंपल भावसार ने अपनी शादी के कार्ड में "एनिमल फीड ड्राइव" अभियान को आगे बढ़ाया है। इसके तहत शादी में इंसान के साथ बेजुबान पशु-पंक्षियों को भी अपना मेहमान बनाया है।
व्यक्तिगत स्तर पर जब इतने महान मुद्दों पर लोग काम कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर क्षुद्र मुद्दे क्यों छाए हुए हैं?
मुद्दत से हम पाषाण को भगवान बनानेवाले हैं
फिर मुद्दे आजकल के क्यूं भटकानेवाले हैं??
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹