पेपर लीक से नाउम्मीद होते युवा
May 12, 2022संवाद
"पेपर लीक से नाउम्मीद होते युवा"
बरसों की पढ़ाई के बाद बामुश्किल से परीक्षा का दिन आता है और परीक्षा अच्छा जाने की खुशी कुछ देर में ही पेपर लीक की खबर से काफूर हो जाती है और टूटे हुए दिल को मिलता है सिर्फ इंतजार.....
बरसों की कठिन साधना के साथ प्राण नहीं क्यों लेते हैं?
अब किस सुख के लिए मुझे धरती पर जीने देते हैं??"
रश्मिरथी में राष्ट्रकवि दिनकर ने ये पंक्तियां कर्ण के मुख से परशुराम के प्रति कहलवाई थी,जब उन्होंने अपना दिया हुआ ब्रह्मास्त्र-ज्ञान उससे वापस ले लिया।
आज हर परीक्षार्थी कर्ण के रूप में आ गया है और यही प्रश्न खड़े कर रहा है- "वर्षों की कठिन साधना के बाद दी जाने वाली परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है और वे सरकारी नौकरी रूपी ब्रह्मास्त्र को पाने से भ्रष्ट-व्यवस्था के कारण वंचित रह जाते हैं, तो तड़प तड़प कर जीने के लिए अब उन्हें क्यों छोड़ा जा रहा हैं???
एक बीपीएससी परीक्षार्थी को पेपर लीक की खबर सुनकर सांत्वना देने के लिए जब मैंने फोन किया तो उसका जवाब मुझे आश्चर्य में डाल दिया। उसने कहा - "मैं इस समय दुखी नहीं बल्कि बहुत खुश हूं। क्योंकि आप समय-समय पर पूछते रहते हैं कि 10 वर्षों की सघन तैयारी के बाद किसी परीक्षा में मुझे सफलता क्यों नहीं मिलती हैं? आपके इस प्रश्न का उत्तर अब मैं दे सकने की स्थिति में हूं। मां-बाप अपना पेट काटकर और खेत बेचकर शहर में मुझे सरकारी नौकरी के लिए सुविधाएं दे रहे हैं और मैं भी अपना जी जान लगाकर पढ़ाई कर रहा हूं; फिर भी न जानें इन परीक्षाओं में क्या धांधली हो रही है कि पता ही नहीं चलता।
जब उसी परीक्षा में मेरी जान पहचान का पढ़ाई में अत्यंत कमजोर साथी जुगाड़ से मेरिट लिस्ट में स्थान पा लेता है तो मेरी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। पहले इस भ्रष्टाचार की बात पर कोई विश्वास नहीं करता था किंतु अब बीपीएससी जैसे बड़े एग्जाम के पेपर लीक प्रकरण ने भ्रष्ट व्यवस्था की सारी कलई खोलकर रख दी है।"
प्रतिभासंपन्न और परिश्रमी विद्यार्थी के मुख से इन बातों को सुनकर मैं अवाक् रह गया।
मैंने भी अपने विद्यार्थी जीवन में पचासों परीक्षाएं दीं। उस समय पेपर लीक का मामला होता ही नहीं था और भ्रष्टाचार की उड़ती खबर आटे में नमक के समान होती थी। नियमित अंतराल पर होने वाली परीक्षाओं में कभी प्रीलिम्स में तो कभी मुख्य परीक्षा में सफलता मिलती रहती थी और साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने पर आशा जिंदा रहती थी। 17 (seventeen)साक्षात्कार देने के बाद सरकारी नौकरी पाने में सफल हो गया। यही अनुभव परिवार में और रिश्तेदारों में बहुतों का रहा।
पेपर लीक न होने का अनुभव और बिना पैसा दिए सरकारी नौकरी पा लेने का मेरे समय का मेरा अनुभव आज के नियमित पेपर लीक मामले को हजम नहीं कर पा रहा है। और उस पर से बहुत सारी सीटों के मामले में लाखों के लेनदेन को तो समझ भी नहीं पा रहा है।
इन परीक्षार्थियों की पीर अब पर्वत सी हुई जा रही है। हजारों रुपए फॉर्म भरने के समय खर्च हो जाते हैं और फिर परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में हजारों रुपए और उस पर से पेपर लीक ; लाखों विद्यार्थियों के साथ क्या क्रूर मजाक नहीं ??
जो विद्यार्थी फॉर्म भरने का पैसा भी बामुश्किल जुटा पाते हैं, वे दूरदराज के परीक्षा केंद्र पर पहुंचने का खर्चा और कष्ट कितनी मुश्किलों से सह पाते होंगे। और उस पर से पेपर लीक.…..
और उस पर से दिन के उजाले में हुए पेपर लीक की जानकारी रात के अंधेरे में शीर्ष तक पहुंचती है........ और उस पर से यह कहा जाता है कि कोई विशेष चिंता की बात नहीं...... .....नौजवानों को नाउम्मीदी की ओर धकेलता जा रहा है।
मेरी सोच यह है कि नौजवान नाकाम होते रहें तब तक चिंता की कोई विशेष बात नहीं ; किंतु नौजवान नाउम्मीद होने लगें तो यह बहुत बड़े खतरे की घंटी है। क्योंकि नाकामी इंसान को और ज्यादा मेहनत के लिए तैयार करती है किंतु नाउम्मीदी व्यवस्था के प्रति विद्रोह से भर देती है। शायर फैज के शब्दों में-
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।
शाम ढलती है,रात बीतती है ;फिर सुबह का सूरज उगता है। किंतु जब युवा पीढ़ी यह सोचने लगी कि यह शामे-गम कभी खत्म नहीं होगी तो वही घटना घटती है जो आज श्रीलंका में घट रही हैं।
पुरानी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि नई पीढ़ी के साथ सहानुभूति ही नहीं समानुभूति से भरें और उनके बिखरते सपनों को सहेजने के लिए संबल प्रदान करने वाली व्यवस्था का निर्माण करें।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹