राजद्रोह पर सुप्रीम नजर
May 16, 2022संवाद
"राजद्रोह पर सुप्रीम नजर"
राजद्रोह कानून 124A पर सुप्रीम कोर्ट का रूख 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के पक्ष में एक ऐतिहासिक कदम है। 1870 में बने जिस कानून को ब्रिटिश राज ने भारतीयों की आवाज को राजद्रोह बताकर कुचलने के लिए उपयोग किया, उस कानून को भारतीय-राज ने भी आजादी के 75 वर्षों तक अपनाए रखा है और सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों,लेखकों और विचारकों को खूब निशाना बनाया है। आखिर क्या बात है कि जिस कानून की आड़ लेकर विदेशी सरकार द्वारा तिलक और गांधी को जेल में डाला जाता है, उसी कानून की आड़ लेकर अपनी सरकार द्वारा आज भी विरोध में कुछ बोलने या लिखने पर मनमानी तरीके से जेल में डाल दिया जाता है?
दरअसल सत्ता का स्वभाव ऐसा होता है कि बहुत सारे सत्य उसे छुपाने पड़ते हैं और "सत्यमेव जयते" के नारे भी लगवाने पड़ते हैं-
"झूठ बोलने वाला है वो,उसके हाथों में गीता है
संबंधों के पैबंदों को सिर्फ बातों से ही सींता है।"
सत्य का उपयोग सत्ता एक साधन की तरह करती है। अतः जो सत्यांश दिखाने लायक है, उसका तो खूब प्रचार-प्रसार करती है और जो सत्यांश छुपाने लायक है, उसका गला घोंटने लगती है। अर्ध-सत्य बहुत खतरनाक होता है।
जब कोई विपक्ष या विचारक सत्ता द्वारा दिखाए गए अर्ध- सत्य के विरोध में पूर्णसत्य को रखने का प्रयास करता है तो उससे सत्ता बेनकाब होती है।
धर्म के क्षेत्र में सत्य साध्य होता है, साधन नहीं। किंतु राजनीति के क्षेत्र में ठीक इसके विपरीत स्थिति होती है।
शिक्षाविद,लेखक या विचारक जो सरकार की कमियां गिनाने लगते हैं, उससे सरकार विरोधी जनमत का निर्माण होता है।
राजतंत्र में लूई14 कहा करता था कि 'मैं ही कानून हूं' किंतु लोकतंत्र में "कानून का शासन" होता है, किसी व्यक्ति का नहीं। संविधान की शपथ लेकर सरकारें यहां काम करती हैं। यदि संविधान के किसी कानून का उल्लंघन किया जाता है तो नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय अपनी भूमिका का निर्वाह करता है।
मौंटेस्क्यु के "शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत" के तहत कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका में शक्तियों का बंटवारा किया जाता है ताकि एक दूसरे को संतुलित रख सकें। प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया दर्पण की भूमिका में सभी को सजग करता रहता है और जनमत का निर्माण भी।
2014-20 के बीच दायर किए गए 399 राजद्रोह के चार्जशीट में से महज 8 अपराध सिद्ध हुए तो राजद्रोह कानून की काफी आलोचना होने लगी। आंदोलन में भाग लेने पर,जन सरोकार के मुद्दे उठाने पर और नेताओं के विरुद्ध व्यक्तिगत टिप्पणी करने पर जब राजद्रोह कानून लगाया जाने लगा तो इसके विरुद्ध दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया। मुख्य न्यायाधीश रमन्ना ने अभी अपने वक्तव्य में कहा कि सरकारों द्वारा न्यायालय की अवमानना न्याय प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
लोकतंत्र में सत्ताधीश की आलोचना राज्य की आलोचना जब समझा जाने लगता है तो कदम "राजतंत्र" की ओर बढ़ने लगता है। निरीह नागरिक को फिर मीडिया से और न्यायालय से कुछ आस बनती है।
लोकतंत्र के इंडेक्स में भारत का गिरता ग्राफ हम सभी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। राजद्रोह कानून के पर कटने से निश्चितरूपेण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बल मिलेगा।
किंतु "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कभी भी अबाध नहीं हो सकती। स्वतंत्रता का सदुपयोग आपकी स्वतंत्रता को और बढ़ाता है जबकि दुरुपयोग स्वतंत्रता के लिए आत्मघाती साबित होता है।
सत्य-प्रेम-अहिंसा की व्यक्तिगत साधना को राजनीतिक धरातल पर उतारने वाली गांधी ने अपने विरोधियों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस प्रकार से सदुपयोग किया कि कोई भी उनकी नीति और नीयत पर सवाल नहीं उठा सकता था।
किंतु दुर्भाग्य से आज देश में हेट स्पीच की बाढ़ आ गई हैं जिसमें नीयत तो गंदी दिखती ही है, नीति का भी ख्याल नहीं रखा जाता। इससे दिलों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग के लिए ही शिक्षा और साधना दोनों की जरूरत होती है। सम्यक-शिक्षा का जितना व्यापक प्रचार-प्रसार होगा और जिम्मेदारी की भावना की साधना जितनी बढ़ेगी उतना ही हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹