संवाद


 "दया धर्म का मूल है"


दिल्ली के मुंडका में एक इमारत में आग लगी और 27 जिंदगी जलकर खाक हो गई। अपनों को ढूंढते हुए रोते-बिलखते परिजनों को देखना हृदय को दहला देने वाला मंजर था।


जिस आग में जलते हुए लोग अपनी जान बचाने के लिए मदद की गुहार लगा रहे थे, उस आग को देखकर दो प्रकार की प्रतिक्रिया हुई- एक तरफ इमारत का मालिक मनीष अपने परिवार सहित भाग गया और दूसरी तरफ रोड के उस पार से गुजरते हुए क्रेन-ऑपरेटर बंधु दया तिवारी और अनिल तिवारीअपनी आत्मा की पुकार पर आग से लोगों को बचाने के काम में अपनी जान जोखिम में डालकर भी लग गए।


प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कम से कम 55 जिंदगियां इन्होंने बचा लीं।


जिसकी जिम्मेवारी थी, जो बिल्डिंग का मालिक था और जिसका नैतिक कर्तव्य था, वह भाग गया किंतु जो दिन भर का काम करके आराम के लिए घर लौट रहा था,जिसका कोई भी संबंध इस बिल्डिंग से और आग से नहीं था, वह डिवाइडर पार करा कर के अपना क्रेन लाया और आग में जलते हुए लोगों के लिए मसीहा बनकर उभर गया। क्रेन को भारी क्षति हो सकती थी, उनकी जान को खतरा हो सकता था, ऐसी बातें उनके लिए अमहत्वपूर्ण हो गईं।


ये दो विपरीत उदाहरण आज देश के सामने हैं - एक तरफ करोड़ों की बिल्डिंग का मालिक और दूसरी तरफ दिन भर की कमाई से बामुश्किल गुजारा करने वाला दया से भरा हुआ आमजन।


दो आंखों से तो यही दिखाई दे रहा है कि करोड़ों का मालिक अमीर है और किसी प्रकार से रोजी-रोटी कमाने वाला बेचारा गरीब । लेकिन तीसरी आंख से देखें तो जिसे दुनिया बाहरी-संपदा के आधार परअमीर कहती हैं,उससे ज्यादा गरीब ढूंढना मुश्किल है; और जिसे हम गरीब समझते हैं उसकी आंतरिक-संपदा यदि दिखाई पड़े तो उससे बड़ा बादशाह इस दुनिया में कोई नहीं।


इस हृदय विदारक घटना के दो दृश्य मेरी आंखों के सामने नाच रहे हैं। एक तरफ एक किशोरी जो अपनी बहन को इस आग में ढूंढने आई थी, बड़ी मर्मांतक आवाज में चीख रही थी- "अमीरों को न जानें कितना पैसा चाहिए जो बिना पब्लिक-सेफ्टी का ख्याल रखे, अवैध-धंधे में लगे रहते हैं। हम गरीबों को मार दो ताकि अमीर चैन से जी सकें। यदि हमारी बहन मर गई तो हम लोगों ने तो आत्महत्या का निर्णय कर लिया है। अमीरों की इस दुनिया में जीना नहीं है।"


दूसरी तरफ जलने से लोगों को बचाने वाले दया,अनिल, राम जैसी दिव्य-आत्माओं को लोग चारों तरफ से घेरे हुए अपने आंसुओं के साथ हाथ जोड़े साक्षात् भगवान के रूप में निहार रहे हैं।


मुंडका बिल्डिंग की आग कुछ जिंदगियों को लीलकर बुझ गई किंतु एक और आग इस देश में अब दिलों में लगाई जा रही हैं, जिसको बुझने में सदियां लग जाती हैं।


दंगों की आग में अनगिनत जिंदगियां पहले भी स्वाहा हो चुकी हैं । लाखों परिवार घुट-घुट कर जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं, संपत्ति के नुकसान का आकलन करना मुश्किल हो जाता है। इंसानियत जिस पाताल के गर्त्त में गिरती है वहां से उठने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।


देश आज उस खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ता जा रहा है जहां से दो रास्ते दिखाई देते हैं- एक रास्ता है मनीष अर्थात मन के स्वामी का जो आग की घटना के लिए जिम्मेदार होने के बावजूद अपने और अपनों को बचाने के लिए जलते हुए आग से अपना दामन बचा कर भाग जाता है और दूसरा रास्ता है दया जैसे आत्मा की पुकार सुनने वाले लोग का,जो आग की घटना को देखकर अपनी जान जोखिम में डालकर आग से लोगों को बचाने में लग जाते हैं।


जिस धर्म के नाम पर देश में आग लगाने का जाने-अनजाने काम चल रहा है, उस धर्म का मूल दया है। बाबा तुलसीदास के शब्दों में-


"दया धर्म का मूल है , पाप मूल अभिमान


तुलसी दया न छोड़िए जब तक घट में प्राण।"


चुनाव आपको करना है कि आप स्वार्थी-मन की पुकार सुनेंगे या दयापूर्ण-आत्मा की?


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹