आस्था,तर्क और सियासत
May 21, 2022संवाद
"आस्था,तर्क और सियासत"
हे हिंदुस्तान! एक अजीब मोड़ से तेरा कारवां गुजर रहा है। इसे सौभाग्य माना जाए या दुर्भाग्य?
आस्था का ज्वार उमड़ा हुआ है। पूजा-स्थलों को लेकर याचिका,सर्वे और समर्पण को देखकर ऐसा लगता है कि लोग कितने भावनाओं से भरे हुए हैं। जहां पूजा और प्रार्थना में लोगों की इतनी अधिक रुचि हो, वहां तो स्वर्ग उतर आएगा। आस्था हृदय की भावना से जुड़ा हुआ है। यदि हृदय आस्तिक और भावना प्रधान हो गया तो प्रेम और भाईचारा के अतिरिक्त कुछ बचता ही नहीं।
आस्थाप्रधान इन लोगों को जब तर्क करते हुए देखता हूं तो अचरज होता है। जुबान को तलवार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और एक दूसरे को निर्ममता से काट देने की तैयारी हो रही है। तर्क होता ही है रुखा-सुखा किंतु इतना धारदार हो जाएगा कभी सोचा न था। तर्क देने वाला हर इंसान इतने विश्वास से बोल रहा है कि शंका की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। ऐसे तर्कों को सुनकर हिंदू और कट्टर-हिंदू तथा मुसलमान और कट्टर-मुसलमान बनता जा रहा है। बस इंसान की अपनी पहचान को भूलता जा रहा है।
सियासत उस बंदर मामा की भूमिका में आ गयी है जो दो बिल्लियों के बीच हुई एक रोटी की लड़ाई को न्यायसंगत ढंग से सुलझाने का प्रयास कर रही है। सियासी सुलझाव के प्रयास में रोटी कम होती जा रही है और झगड़ा बढ़ता जा रहा है। सियासत कभी आस्था की दुहाई देती है तो कभी संविधान की। इसमें जो भी सियासतदान जितनी कट्टरता दिखा रहे हैं,उतने ही ज्यादा लोकप्रिय होते जा रहे हैं।
शिक्षा-स्वास्थ्य-महंगाई-रोजगार की चिंता में मरता जा रहा आम आदमी पूछ रहा है कि हमारी बात कब होगी। पूजा-प्रार्थना की जहां इतनी ऊंची बातें चल रही हो ,वहां पर "पापी पेट के सवाल का मुद्दा उठाना" एक आम नागरिक को अपराधबोध से भर दे रहा है। किंतु "भूखे भजन न होय गोपाला, ले लो अपनी कंठीमाला" की पीड़ा को महसूस करता हुआ आम नागरिक अब एक दूसरे से पूछ रहा है कि आम नागरिक का मुद्दा कहां है?
माना कि हिंदू मुसलमान का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है किंतु क्या इंसान का मुद्दा कोई मुद्दा ही नहीं? कवि नीरज के शब्दों में-
"ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आजकल मेरे हिंदुस्तान की
नीरज से बढ़कर और सुखी कौन हैं यहां
उसके हृदय में पीर हैं सारे जहान की।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹