संवाद


"साइबर ठगी में 9लाख गए और आए भी"


'₹900000 आपके अकाउंट से 4 बार में निकाले गए हैं, क्या आप इसकी पुष्टि करते हैं?'- SBI का यह फोन सुनकर बांसवाड़ा में मेरे परिचित डॉक्टर साहब के होश उड़ गए। उन्होंने एक सूचना पर बिजली बिल जमा करने हेतु एक ऐप डाउनलोड किया था और मामूली सी रकम जमा भी करा दिया था ताकि इस भीषण गर्मी में विद्युत-कनेक्शन न काट दिया जाए।


आंखों के आगे अंधेरा छा गया किंतु "आर्ट ऑफ लिविंग" से जुड़े होने के कारण पूज्य गुरुदेव का प्रकाश उनके अंतरस्थल में चमका। दूसरे क्षण उनके मन में "होईहें वही जो राम रचि राखा" का गुरु-मंत्र गूंजा और उन्होंने शांति से जवाब दिया कि- 'नहीं, मेरे साथ फ्रॉड हुआ है।'


साइबर-क्राइम की ऐसी घटनाएं किसी के हर्टअटैक के लिए पर्याप्त होती है किंतु हर्ट-रिलेशन ने संभाल लिया और एक मित्र उनके साथ कार्रवाई में जुट गए। पुलिस विभाग ने उनका FIR दर्ज किया, SBIबैंक के आला अधिकारियों ने तुरंत अपनी तरफ से रातोंरात सारे स्टेप्स उठाए।


मीडिया ने प्रमुखता से इसको हेड लाइन बना दिया। रात भर की परेशानी के बाद सुबह में न्यूज़पेपर पढ़कर निहायत भोलेभाले डॉ साहब को सबसे पहले यह चिंता हुई कि- 'बुजुर्ग पिताजी कहीं आज का यह पेपर न पढ़ लें और कोई अनहोनी न हो जाए।' अतः उन्होंने पिताजी को वह न्यूजपेपर उपलब्ध करवाया, जिसमें घटना के साथ उनके नाम का जिक्र नहीं था।


एक तरफ उनको कई प्रकार की पुलिस,बैंक इत्यादि की औपचारिकताएं बिना समय गवाएं पूरी करनी थी तो दूसरी तरफ न्यूज़पेपर में नाम के आते ही फोन की घंटी बजने लगी और शुभेच्छु घर आने लगे। उनका तनाव इतना बढ़ गया कि उन्हें पता नहीं चल रहा था कि- 'क्या करें और क्या न करें?'


किंतु साइबर क्राइम एक्सपर्ट्स, पुलिस व बैंक से संबंधित विभागों के ऐसे संवेदनशील लोगों से उनकी मुलाकात हो रही थी कि निराश होता हुआ मन बार-बार आशा से भर जाता था।


48 घंटे के अंधकारपूर्ण,अनिश्चयपूर्ण और तनावपूर्ण वक्त के बाद उनको यह वाक्य सुनने को मिला कि- "आपका पैसा सुरक्षित है।"


उन्होंने आंखें ऊपर उठाई; पर उनकी आंखों में आंसू छलक आए।एक तरफ साइबर क्राइम ने व्यवस्था से उनका विश्वास डिगा दिया था तो दूसरी तरफ त्वरित कार्रवाई से happy-ending ने इसी व्यवस्था में छुपे कुछ देवदूतों के सामने सर झुकाने को उन्हें मजबूर कर दिया।


नौ लाख जाने और आने के इस आपबीती को जब उन्होंने मुझे सुनाया तो अंत में उनके मुख से यही निकला कि "न जाने कौन सा पुण्य काम आया?"


"जब निगाहों में सिमट जाते अंधेरे


जिंदगी बिखरे समय के खा थपेड़े


कौन धुंधलाई हुई परछाइयों में


जिंदगी के कण तमाम समेट लेता?"


मेरे मन में यह विचार उठा कि जिस जमाने में लोग इंसानों से धर्म के नाम पर नफरत करने लगे हैं और नाम पूछ कर मारने लगे हैं, उस जमाने में आप पशुचिकित्सक होने के नाते जानवरों से भी बेहद प्रेम से उनका दुख दूर करते हैं, यह क्या कम पुण्य है‌।


वक्त के थपेड़े से जिंदगी के बिखरे हुए कणों को समेटने वाली इस घटना में मुझे तो दृश्य से ज्यादा अदृश्य पहलू ने प्रभावित किया-१.खोने की घटना के क्षण में गुरु और प्रभु की याद आना,२. पिता की सुरक्षा का ख्याल मन में उठना,३. पशुओं के प्रति भी दया भाव से भरा होना और ४.सेवाभावी लोगों से मुलाकात का सौभाग्य।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹