नफरती विचार से हिंसक व्यवहार तक
May 23, 2022संवाद
"नफरती विचार से हिंसक व्यवहार तक"
"मुहम्मद" समझकर बुजुर्ग भंवरलाल को मारने वाला दिनेश का वीडियो मनोवैज्ञानिक-विश्लेषण का विषय है। शायद ही कोई हो जो इस पर गर्व करे। शर्मसार करने वाले इस कृत्य का वीडियो बनाकर वायरल करने की मानसिकता को गहराई से समझने की जरूरत है।हमें सबक लेकर स्वाध्याय में उतरना ही होगा वरना हमारी पीढ़ियां भटक जाएगी।
ऐसी किसी घटना को पार्टी और धर्म से जोड़ देने से मामला राजनीतिक हो जाता है और मनोवैज्ञानिक-अध्ययन से मामला शिक्षा देने वाला बन जाता है।
शिक्षा और शिक्षक जिस विचार (thought)को जन्म देते हैं वही बाद में कृत्य(action) बन जाता है। इसमें पारिवारिक-शिक्षा से लेकर विद्यालयी- महाविद्यालयी-शिक्षा भी शामिल है।
आखिर इतनी नफरत और हिंसा 'दिनेश' के मन में कैसे भर गई? "वह क्या पढ़ता है और क्या सोचता है?" -इस पर शोध किया जाना चाहिए। यदि मॉबलिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं तो जरूर उसके मानसिक और वैचारिक आधार कहीं से मिल रहे हैं, उन आधारों को ध्यान से समझने का प्रयास होना चाहिए।
"निज-अनुभव" -एक बार मैं रोड के किनारे एक मीट की दुकान पर खड़ा था और एक 'किशोर' मुर्गियों की गर्दन मरोड़ कर एक डब्बे से दूसरे डब्बे में डाल रहा था। 5 मिनट में मेरा संतुलन बिगड़ गया और बहुत देर तक मैं असहज रहा। तन से मजबूत होने पर भी मैं मन से कमजोर निकला और वह किशोर तन से कमजोर होने पर भी मन का बहुत कठोर निकला।
इस मन के निर्माण की पृष्ठभूमि पर गौर करने की बात है। मेरे शाकाहारी घर में प्याज भी बाहर में रखा जाता था क्योंकि मां-बाप प्याज नहीं खाते थे। मीट की तो बात ही छोड़ दीजिए। पूजा के लिए तुलसी के पत्ते को तोड़ते समय घर के लोग कुछ बुदबुदाते थे। बाद में पता चला कि मंत्र पढ़कर और प्रार्थना करके पत्तों को तोड़ा जाता था-भाव था कि हम आपको कष्ट दे रहे हैं, इसके लिए क्षमा करना। पहली रोटी गाय की और अंतिम रोटी कुत्ते की भी मां हमेशा निकालती थी।
यह कोई महानता की बात नहीं है,यह तो हिंदू परिवार के घरों की कंडीशनिंग है। इसमें इतनी बात जरूर अच्छी है कि ऐसी कंडीशनिंग से संवेदनशीलता बढ़ती है और आप किसी की गर्दन नहीं मरोड़ सकते।
यहां पर दोस्तोवस्की के उपन्यास 'क्राईम एंड पनिशमेंट' का पात्र रासकलोनिकोव की चर्चा बहुत उपयोगी है। जब वह स्टूडेंट था तो उसके सामने वाले मकान में एक अमीर बुढ़िया रहती थी, जो लोगों को बहुत ऊंचे ब्याज दर पर पैसा देती थी। कर्ज न चुकाने पर बहुत अपमानित करती थी। रासकलोनिकोव के मन में यह विचार उठता था कि इस बुढ़िया को कोई मार क्यों नहीं देता? अचानक उसे पैसे की जरूरत पड़ती है और वह बुढ़िया के पास जाता है। बुढ़िया जब कागज पर उसका साइन करवाती है तो ब्याज दर को देखकर उसे गुस्सा आता है और वह बुढ़िया की गर्दन दबा देता है।
जेल में पड़ा हुआ वह स्वयं से पूछ रहा है कि मुझसे मर्डर कैसे हो गया? उसके मन में बुढ़िया के प्रति मार देने के 'विचार' जो उठते थे, वही आज 'कृत्य' बन गया था।
यदि विचार के प्रति हम होश से नहीं भरते हैं तो "रासकलोनिकोव" और "दिनेश कुशवाहा" हर व्यक्ति में बैठा हुआ है। फिर व्यक्ति के कृत्य की सजा सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, बल्कि परिवार और पूरा समुदाय भुगतता है-
"युग युग तक परिवार से कीमत करे वसूल
कभी किसी एक मोड़ पर किसी एक की भूल।"
अब इस घटना का दूसरा पहलू समझने के लिए "टॉलस्टॉय" की एक छोटी कहानी को समझने का प्रयत्न करें। एक बड़े जमींदार का इकलौता बेटा किसी बात पर नाराज होकर घर से चला गया। जमींदार ने भी अहंकार में उसे कुछ वर्षों के लिए भुला दिया। किंतु 5 वर्षों के बाद अपनी बीमारी के क्षणों में जमींदार को यह महसूस हुआ कि यदि मुझे कुछ हो गया तो इतनी बड़ी जायदाद का मालिक कौन होगा?
उसने बेटे से संपर्क किया और लौटने का आग्रह किया। उस गांव में एक रेलगाड़ी रात में 2:00 बजे आती थी, जिससे उसका बेटा आने वाला था। जमींदार स्टेशन के गेस्ट हाउस में उस सर्द रात में 1:00 बजे पहुंचा। अंधेरे में वहां पर बुखार और खांसी से तपते हुए एक व्यक्ति की कराह से चिढ़कर उसने अपने आदमियों को उसे बाहर निकालने का आदेश दे दिया।
जब बहुत देर तक बेटा नहीं आया तो उसने पता किया। उसे पता चला कि जिस व्यक्ति को उसने खांसने और कराहने के कारण रात बाहर निकलवा दिया था, वह उसका बेटा था जो जल्दी गाड़ी आने के कारण गेस्ट हाउस के बाहर लेटा हुआ था। सर्द रात में उसे बाहर फेंकवाने से वह मर गया था।
क्या यह कहानी आज सच नहीं निकली? जिस व्यक्ति को मुसलमान समझकर हिंदू ने मारा वह व्यक्ति अपने धर्म का ही नहीं,अपनी पार्टी का भी निकला।
सिर्फ दिनेश को गिरफ्तार करने से कुछ नहीं होगा बल्कि "नफरत और हिंसा से भरे हुए दिनेश" को पढ़ना होगा और समझना होगा। "नफरती विचार" बीज है,जिसे खाद-पानी देने पर "हिंसा रूपी" वृक्ष बड़ा होता है। "बीज" को फेंक देना बहुत आसान है किंतु "वृक्ष" को उखाड़ पाना बहुत मुश्किल।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे 🙏🌹