सरकारी शिक्षा पर सोनू के सवाल
May 26, 2022संवाद
"सरकारी शिक्षा पर सोनू के सवाल"
जर्जर सरकारी शिक्षा व्यवस्था से अतृप्त होना बिहार के वायरल बॉय सोनू के पढ़ने की "प्यास" को बताता है।आईएएस का सपना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही पूरी कर सकती है, इसका 11 वर्ष की कम उम्र में आभास होना सोनू की "प्रतिभा" का परिचायक है। इसके लिए मुख्यमंत्री के पास निवेदन हेतु साइकिल चलाकर अकेले पहुंच जाना उसके "साहस" को दर्शाता है। शराबी पिता की और अयोग्य शिक्षक की वास्तविकता को सबके सामने बताना उसके "सत्य-निष्ठा" को जगत के सामने लाता है।
प्यास,प्रतिभा,साहस और सत्य ऐसे दुर्लभ गुण हैं जो विरले ही एक व्यक्ति में पाए जाते हैं। अतः बिहार का सोनू आज राष्ट्रीय चर्चा का विषय है और माध्यम बना है ताकि - "जीवन निर्माण की सबसे जरूरी किंतु सबसे उपेक्षित शिक्षा-व्यवस्था पर गंभीर चिंतन-मनन किया जाए।"
मैं चाहता हूं कि सोनू की दिली ख्वाहिश पूरी हो और उसे श्रेष्ठ शिक्षा-संस्थान मिले किंतु एक सोनू को श्रेष्ठ शिक्षा-संस्थान में दाखिला दिला देना इस समस्या का समाधान नहीं है। समाधान तो इसमें है कि हर शिक्षा-संस्थान को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाए?
क्योंकि प्राचीन काल से ही प्रशिक्षण के अभाव में प्रतिभाएं कुंठा का शिकार होती रही हैं, तभी तो कर्ण द्रोणाचार्य से निराश होकर ऋषि परशुराम तक धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है और वहां पर भी ब्राह्मण न होने के कारण अभिशाप पाता है तथा ब्रह्मास्त्र से वंचित रह जाता है; अंत में दुर्योधन के एहसान के वशीभूत हुआ अधर्मी कौरव-पक्ष में मिल जाता है।
प्रतिभा तो परमात्मा कहीं भी पैदा कर देता है किंतु प्रशिक्षण सब जगह नहीं मिलता-
"कुसुम मात्र खिलते नहीं राजाओं के उपवन में
अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुंज कानन में
कौन जाने रहस्य प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।"
गुदड़ी के लाल को पहचानना और निखारना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। किंतु दुर्भाग्य से सरकारी शिक्षा-व्यवस्था का हाल ऐसा बना दिया गया है कि वहां पर प्रतिभा खिलने के विपरीत कुम्हला जाती है। और उसे इतना बदनाम किया जा रहा है कि कोई भी मजबूरी के सिवाय स्वयं की इच्छा से सरकारी शिक्षा व्यवस्था में नहीं जाना चाहता है।
सोनू की इस बात से मैं सहमत नहीं हूं कि सरकारी शिक्षा में शिक्षक अयोग्य हैं और पढ़ाना नहीं चाहते हैं, कुछ अपवाद को छोड़कर। दुर्भाग्य तो यह है कि योग्य शिक्षकों का सदुपयोग सरकारी व्यवस्था में नहीं हो पा रहा है।
"नई शिक्षा नीति" पर भारत सरकार द्वारा आयोजित विचार मंथन हेतु जिला कलेक्ट्रेट बांसवाड़ा में अपने कॉलेज प्रतिनिधि के रूप में मैं उपस्थित था। जिले भर के जनप्रतिनिधि,अधिकारी (कलेक्टर से लेकर सभी प्रमुख अधिकारी) और शिक्षाविद् उसमें उपस्थित थे।
एक विधायक जी ने सभा से प्रश्न पूछा कि आप लोगों में से जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हों, वे हाथ उठाएं। एक भी हाथ सभा में नहीं उठा। विधायक जी ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि सरकारी स्कूल की दुर्दशा का कारण यह है।
मैं तुरंत उठा और प्रश्न किया कि इस सभा में कितने लोग हैं जिनकी स्कूली-शिक्षा प्राइवेट-स्कूलों से हुई हैं। इस प्रश्न के उत्तर में भी एक भी हाथ नहीं उठा।
तब मैंने सभा को निवेदन किया कि अब विचार का बिंदु यह है कि आज सरकारी शिक्षा की दुर्दशा का मुख्य कारण क्या है? हम सभी के सरकारी शिक्षक ने हमें पढ़ाकर इस योग्य बनाया कि आज हम अधिकारी पद पर हैं क्योंकि "हमारे समय में शिक्षक का काम था- सिर्फ पढ़ना और पढ़ाना। कुछ शिक्षक तो घर पर भी पढ़ने के रूटीन को चेक करने के लिए विद्यार्थी के घर जाया करते थे।"
आज का शिक्षक सुबह में ब्रेकफास्ट और मिड डे मील की तैयारी करता है, दिन में सूचनाओं को जुटाकर भेंजता है, चुनाव आने पर बीएलओ से लेकर जोनल मजिस्ट्रेट तक की भूमिकाओं का निर्वाह करता है, पशुगणना से लेकर जनगणना तक का काम निपटाता है और समय-समय पर विभिन्न सरकारी योजनाओं का संदेश और लाभ जनता तक पहुंचाता है। इन सबके बीच में समय बच जाए तो विद्यार्थी के संपर्क में आता है।
मेरे घर में खाना बनाने वाली बाई जी ने अपनी पोती के एडमिशन के लिए मुझसे सलाह मांगा तो मैंने कहा कि सरकारी स्कूल में बहुत योग्य शिक्षक होते हैं,वहीं पर एडमिशन कराइए; आपका पैसा भी कम खर्च होगा। बाई जी का जवाब था कि सर! बच्ची को पढ़ाना है और जीवन बनाना है,खाना खिलाने के लिए भेजना नहीं है।
आखिर ऐसी शैक्षिक परिस्थिति और सामाजिक सोच क्यों और कैसे बनी?
शिक्षा बजट और रक्षा बजट की परस्पर-तुलना करें तो आपको बहुत सारे प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे?
जिस नालंदा विश्वविद्यालय की धरती पर विश्व भर की प्रतिभाएं कभी पढ़ने के लिए आती थीं, उसी नालंदा धरती की प्रतिभा श्रेष्ठ शिक्षा-संस्थान के लिए हाथ जोड़े खड़ा है।
न तो हम अपनी प्रतिभा को विकसित कर पा रहे हैं और न हम उन्हें अपने देश में रोक पा रहे हैं। आखिर क्यों?
सोनू का प्रश्न कुछ दिनों में भुला दिया जाएगा और कोई निरर्थक मुद्दा उठा दिया जाएगा। लेकिन दिल को कचोटनेवाला और दिमाग से कभी न भुलाने वाला यथार्थ प्रश्न जिस साहस के साथ सोनू ने दुनिया के सामने रखा है, कोई संवेदनशील शिक्षा प्रेमी या शिक्षक नहीं भुला सकता।
आखिर यह कैसी सरकारी व्यवस्था है कि योग्य शिक्षक अपनी प्रतिभा का उपयोग प्रतिभा को तराशने के लिए नहीं कर पा रहा है और अपयश का भागी बनता जा रहा है?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹