प्रमुख हिंसक कौन-मन या कल्चर ऑफ गन?
May 29, 2022संवाद
"प्रमुख हिंसक कौन-मन या कल्चर ऑफ गन?"
वैज्ञानिक-मन ने एटम-शक्ति की खोज की थी सृजन के लिए ; किंतु राजनीतिक-मन ने हिरोशिमा नागासाकी पर एटम-बम गिरा कर उससे विध्वंस कर दिया।
कहां अमेरिका और कहां बांसवाड़ा! कोई साम्य नहीं। लेकिन एक समान खबर प्रमुखता से छपी है - "वीडियो गेम के आदी किशोरों के हिंसक होते जाने की।" अमेरिका में एक किशोर ("रामोस") गन से मासूम और निर्दोष 22 लोगों को एलिमेंट्री स्कूल में घुसकर मार देता है तो बांसवाड़ा में एक नाबालिग 'फ्री फायर गेम' की लत के कारण मोबाइल नहीं देने पर अपने दोस्त को पत्थर से मार देता है।
"विचार का विषय है कि गन प्रमुख कारण है या मन?"
अमेरिका में "गन-कल्चर" के कारण बिस्किट से ज्यादा आसान बंदूक खरीदना हो गया है। वहां हर सौ लोगों में 120 बंदूकें हैं। बंदूक लौबी इतनी ताकतवर है कि अपने पैसों के बल पर सांसद और सीनेटरों को अपने पक्ष में मिला लेती हैं। इसी कारण से हर हिंसक हमले के बाद बंदूकों की बिक्री और बढ़ जाती है। आज अमेरिकी स्कूलों में हथियारबंद- टीचर्स बढ़ाने पर बहस छिड़ी हुई है।
किंतु यदि मन अहिंसक हो तो क्या रक्षक "गन" को भक्षक की तरह उपयोग किया जा सकता है?
यदि मन हिंसक हो तो फूल को भी पत्थर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और यदि मन अहिंसक हो तो पत्थर को भी ball की तरह खेल का विषय बना सकता है।
अतः अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन का इस मर्मांतक घटना पर सिर्फ बंदूकों का समर्थन करने वालों के खिलाफ खड़े होने का आह्वान समस्या के मूल कारण को नजरअंदाज करता दिख रहा है। मन के निर्माण पर तो उन्होंने कोई चिंता जाहिर नहीं की।
"गन-कल्चर" पर तो निश्चितरूपेण रोक लगनी चाहिए किंतु जहां 'गन-कल्चर' नहीं है,वहां पर भी हिंसा हो रही है-कभी थप्पड़ से तो कभी लाठी-डंडे से तो कभी पत्थर से। बालमन से लेकर आमजन तक में बढ़ती हुई हिंसा को देखते हुए उपचार का प्रमुख विषय "मन" को ही बनाया जाना चाहिए।
मन की प्रमुखता के कारण मानव सभी जीवों में अतिविशिष्ट बन गया। यह मन यदि प्रेम से वंचित रह जाए तो हिंसक "अंगुलिमाल" बन जाता है और यदि यह मन प्रेम से भर जाए तो "बुद्ध" बन जाता है। कोई "जानवर" न तो अंगुलिमाल के समान हिंसक बन सकता और न ही बुद्ध के समान करुणावान बन सकता है। ये दोनों संभावनाएं सिर्फ मनुष्य की हैं।
यह मन तो मिट्टी के लोंदे के समान हैं। मिट्टी के लोंदे से एक कुम्हार "चिलम" बना रहा था। पास से गुजरते हुए एक "शिक्षक" ने कहा कि चिलम तो स्वयं भी जलेगी और दूसरे को भी जलाएगी; तुम इस मिट्टी से सुराही क्यों नहीं बनाते? कुम्हार को बात पसंद आई और वह सुराही बनाने लगा।
मिट्टी से आवाज आई कि हे कुम्हार! शिक्षक की बात मानकर तुम्हारा तो विचार बदला किंतु मेरी तो पूरी जिंदगी बदल गई। सुराही बनकर मैं स्वयं भी शीतल रहूंगी और दूसरे को भी शीतल जल दूंगी।
मां-बाप का प्यार नहीं मिलने पर 'शीतल-मन' स्वयं जलने और दूसरे को जलाने वाला "अंगार-मन" बन जाता है। अमेरिकी समाज में मां और बाप दोनों कई शादियां करते हैं, जिसके कारण बच्चा सब कुछ रहते हुए लावारिस की जिंदगी जीता है।
भारतीय समाज में भी संयुक्त परिवार खत्म होने के बाद मां बाप की महत्वाकांक्षा अथवा गरीबी के कारण बचपन प्रेम से वंचित रह जा रहा है। जीवन के प्रथम शिक्षक मां-बाप से वंचित बच्चे को आजकल के व्यावसायिक जमाने में "टीचर या गुरु" भी प्रेम से भरे हुए नहीं मिल पा रहे हैं।
ऐसे में बाल-मन का शिक्षण आसानी से उपलब्ध मोबाइल के कामुक और हिंसक वीडियो कर रहे हैं। फिर बलात्कार और हिंसा की घटनाएं घटती है तो उपचार के नाम पर ऐसा इलाज किया जाता है कि मानो बुखार से तपते हुए व्यक्ति को बर्फ की सिल्ली पर लिटा दिया जाए।
बुखार तो एक लक्षण है जो अंदर की बीमारी का सूचक है। "मां-बाप-गुरु" का प्रेम और ध्यान जब तक बाल-मन को नहीं मिलता तब तक बीमारी जड़-मूल से नहीं जाएगी।
"तितलियों के पीछे दौड़ने वाले मन के लिए कामुक हिंसक वीडियो बनाता है
यह कौन है जो आग भी लगाता है और पानी पानी भी चिल्लाता है?"
भारतीय संस्कृति में "मातृ देवो भव,पितृ देवो भव, गुरु देवो भव" की घोषणा ऋषियों ने इसीलिए की थी क्योंकि वे जानते थे कि इन तीनों के प्रेम और ध्यान के कारण मन या तो सुमन बन जाता है या मन मिट जाता है और "अ-मन" (शांति) होने से आत्मन् खिल जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹