संवाद


"गुदड़ी के लाल-धनुषेश्वर जी"


विश्व तीरंदाजी प्रतियोगिता के स्टेज 2 में स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम के कोच "श्री धनेश्वर जी" मेरी नजर में अभिनंदन के तो पात्र हैं ही किंतु उससे ज्यादा अनुकरण के पात्र हैं। बांसवाड़ा जैसे सुदूर पिछड़े क्षेत्र से जब कोई प्रतिभा प्रतिकूल परिस्थितियों से निकलकर भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं तो कई प्रतिभाओं के अरमान मचलने लगते हैं और उन्हें जीवन के अभाव और अंधकार में एक मार्ग दिखाई दे जाता है-


" कौन जाने रहस्य प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल


गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।"


तीरंदाजी में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करने वाला वही शख्स जब कोच बनकर अपनी टीम को स्वर्ण पदक दिलवाता है तो ऐसा लगता है कि आधुनिक एकलव्य "धनुषाचार्य" के रूप में भी अपनी सफलता की नई कहानी लिख रहा है।


लेकिन सिर्फ स्वर्ण पदक पर चर्चा हो तो कंटकाकीर्ण रास्तों पर किया गया संघर्ष ओझल हो जाता है। सिर्फ उपलब्धि पर जोर देते ही वह तपस्या गौण हो जाती है, जो उपलब्धि तक पहुंचाती हैं।


10 वर्षों के सघन खेल जीवन के आधार पर अपने अनुभव से कहता हूं कि भटकाव की ओर जा रहे आज के युवा पीढ़ी को सृजनशील बनाने के लिए अच्छे शिक्षा-संस्थान के साथ अच्छे खेल-मैदान का भी इंतजाम करना होगा।


स्वामी विवेकानंद के शब्दों में "गीता पढ़ने की अपेक्षा फुटबॉल के द्वारा स्वर्ग के अधिक समीप पहुंचा जा सकता है।" आज देश के लिए "धर्म-स्थल" विवाद के केंद्र बनते जा रहे हैं, "क्रीड़ा-स्थल" में वह सामर्थ्य है कि संवाद को पुनः स्थापित कर दे।


जिला खेल अधिकारी,बांसवाड़ा के रूप में जब से श्री धनेश्वर जी ने यहां के खेल मैदान का जिम्मा संभाला, खेल मैदान की सारी सूरत ही बदल गई। जिस खेल मैदान में जाने पर पहले शराब पीने के बाद फोड़ी हुई बोतलें जगह-जगह मिलती थीं, वहां जाने पर अब कंकड़ और कांटों के भी दर्शन नहीं होते। खिलाड़ियों द्वारा लगातार पानी देने से हरी दूब वाली ट्रैक दिखाई देती हैं और समाज जनों के सहयोग से अगल-बगल पेड़ लगाए जाने से चारों तरफ हरियाली के दर्शन होते हैं। कहीं तीरंदाजी,कहीं टेनिस तो कहीं बैडमिंटन इत्यादि अनेक खेलों में लगे हुए युवाओं को देखकर "तपोवन" की याद आ जाती है।


पटना के स्टेडियम में जब मैं खेलने जाया करता था तो ग्राउंड में पहुंचकर साथी खिलाड़ी एक गाना गाया करते थे-


"दिल कहे रुक जा रे रुक जा यहीं पर कहीं


जो बात इस जगह है वह कहीं भी नहीं......"


बांसवाड़ा स्टेडियम में जाकर आज मुझे उसी गाने की याद आती है।


एक खिलाड़ी के हाथ में खेल मैदान मिल जाता है तो उसका कायाकल्प हो जाता है,एक शिक्षक के हाथ में शिक्षा-मंत्रालय मिल जाता है तो वह देवालय बन जाता है।


भारत के पास प्रतिभाओं की कमी नहीं है, कमी तो यह है कि विशेषज्ञों के हाथ में विशेष क्षेत्र नहीं मिल पा रहा है। आज खेल संगठनों के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों को देखें तो बहुत कम खिलाड़ी मिलेंगे।


श्री धनेश्वर जी के साथ मेरा दिन रात का उठना बैठना नहीं है, फिर भी लगाव बहुत गहरा है-


"उनसे जब दिल की मुलाकात होती है


सिर्फ आंखों ही आंखों में बात होती है‌।"


अभी 'युवा दिवस' पर अपने खिलाड़ियों को संबोधित करने के लिए उन्होंने मुझे बुलाया तो मैंने महसूस किया कि 'रील लाइफ' के आइकॉन की अपेक्षा यदि "रियल लाइफ" के आइकॉन जीवन में मिल जाएं तो जीवन बहुत परिवर्तित होता है।


मेरा मानना है कि हर क्षेत्र में "रियल लाइफ" के आइकॉन हैं; यद्यपि उन्हें पब्लिसिटी नहीं मिलती किंतु उनका प्रभाव जीवन पर बहुत पड़ता है। "उपनिषद्" का अर्थ यही है कि अपने आदर्श के समीप जाकर निष्ठापूर्वक यदि बैठा जाए तो बहुत सारे सद्गुण संक्रमित हो जाते हैं।


जरूरत है कि हर क्षेत्र अपनी नई पीढ़ी को दूर के आइकॉन की अपेक्षा निकट के आइकॉन के दर्शन करावे और वह आईकॉन भी नई पीढ़ी में छिपे हुए बीजों का दर्शन करे और उन्हें वृक्ष के रूप में बड़ा करने के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करे। समाज और सरकार की भूमिका इस यज्ञ में पृष्ठभूमि के निर्माण की है।


नहीं मालूम कि मां बाप ने क्या सोचकर इनका नाम धनेश्वर रखा ; मुझे तो इनकी जीवन-निष्ठा 'धन' में नहीं "धनुष" में दिखती है। अतः मैं तो इन्हें आदर के साथ "धनुषेश्वर" अर्थात् 'धनुष का ईश्वर' कहना पसंद करूंगा।


हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं पेरिस में होने वाले वर्ल्ड कप के लिए।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹