संवाद


"मासूमों की शिक्षिका की हत्या के मायने"


कश्मीरी शिक्षिका की स्कूल में नाम पूछकर की गई हत्या ने 'टारगेटेड- किलिंग्स' की संख्या में महज "एक" का इजाफा किया। किंतु इसके साथ कितने और लोग जिंदा मर गए, इसका जवाब "आंकड़ा" नहीं दे सकता सिर्फ "संवेदनाएं" ही माकूल जवाब दे सकती हैं। छाती पीट पीट कर शिक्षिका के परिवार के लोग मातम मना रहे थे जिनकी आंखों के आंसू सूख गए थे किंतु इस दृश्य को टीवी पर देखने वाली हमारी आंखों से आंसू बहते जा रहे थे।


परिजनों पर जो गुजरी है,वह तो थोड़ा बहुत दिखाया जा रहा है किंतु यह शिक्षिका जिन बच्चों के दिलो-दिमाग में बसी हुई होंगी ;उन बच्चों पर क्या गुजरी है, उनको कौन दिखा पाएगा?


मुझे तुरंत पटना विश्वविद्यालय के बी.एड कॉलेज के अपने शिक्षक "डॉ राम नारायण पांडे जी" की याद आई,जिनको किसी अपराधी-छात्र ने गलत तरीके से एडमिशन नहीं करने पर गोली मार दी थी। मुझे याद है कि इस घटना के बाद हम सभी विद्यार्थियों की मनोदशा इतनी अंतर्द्वंद्वग्रस्त हो गई थी कि अपने शिक्षक की अंतिमयात्रा में शामिल हुए बिना दिल मानने को तैयार नहीं था किंतु उनकी अंतिमयात्रा में किस मुंह से जाएं , यह सोचकर शर्म के मारे जा नहीं पा रहे थे क्योंकि हत्या करने वाला हम छात्रों में से ही कोई एक हत्यारा था।


वे अपने उसूल के पक्के और विद्यार्थियों की बहुत चिंता करने वाले शिक्षक थे। B.ed कॉलेज में sports कोटा पर एडमिशन के लिए मैं ट्रायल दे रहा था, तभी चार राउंड गोली की आवाज सुनाई दी। गोली चलाने वाले अपराधी की मांग थी कि स्पोर्ट्स कोटा पर उसका एडमिशन कर लिया जाए। किंतु लिस्ट जब चस्पा हुआ तो उसमें मेरा नाम था, जबकि उनसे कोई विशेष जान-पहचान तक नहीं थी। जान से मारने की धमकी दिए जाने पर भी पांडे सर ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर काम किया।


ऐसे कई विद्यार्थी उनकी सत्यनिष्ठा और सहृदयता के अपने अनुभव उनके मरने के बाद भी महीनों तक सुना सुना कर आंसू बहाया करते थे।


उन्होंने एक दिन मुझे बुलाकर पूछा कि आजकल क्या कर रहे हो? मैंने कहा कि सीडीएस का इंटरव्यू- लेटर आया है जिसके तहत बेंगलुरु जाना है किंतु मैं वहां नहीं जा रहा हूं। उन्होंने कारण पूछा? मैंने कहा कि तीन बार यह एसएसबी इंटरव्यू पहले भी दे चुका हूं, सेलेक्शन तो होता नहीं है; फिर क्या फायदा जाने का। उन्होंने समझाते हुए कहा कि 3 बार रिजेक्शन का मतलब यह नहीं होता है कि इस बार भी रिजेक्शन ही होगा। अतः तुम जाओगे और कोई आर्थिक दिक्कत हो तो मुझे बताओगे। उन्होंने मुझे सिर्फ भेजा ही नहीं बल्कि आने-जाने का टिकट बुक कराने में आर्थिक सहायता भी की।


अब ऐसा शिक्षक जब हम ही छात्र के बीच से किसी की गोली से मारा जाए तो कृतघ्नता और दुर्भाग्य का क्या कहना!


उनका दरवाजा हमेशा विद्यार्थियों के लिए खुला रहता था किंतु उनके मारे जाने के बाद उनके परिजनों के आंसू पोंछने के लिए हम विद्यार्थियों में से आत्मग्लानि के मारे कोई भी जा नहीं पाता था। कुछ हिम्मत करके गए भी तो सर को उठाए बिना आंखें झुकाए हुए थोड़ी देर बैठ कर लौट आए।


सारे कश्मीरी पंडित सामूहिक पलायन के लिए फिर से तैयार हैं। उन्हें एहसास हो रहा है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। एक शिक्षक अपनी अंतर् -पीड़ा व्यक्त करते हुए कह रहे थे कि मेरी निगाहें पढ़ाते समय एक तरफ विद्यार्थियों पर रहती हैं और दूसरी तरफ दरवाजे पर।


इस मनोदशा में गुलशन के नन्हें पौधों को कोई माली सींचे भी तो कैसे सींचे?


इस टारगेटड-किलिंग का परिणाम कितनी दूर तक जाएगा.... काश!इसको वे आतंकी समझ पाते। यह एक शिक्षक की हत्या नहीं हैं ,अपनी पूरी कॉम की हत्या है।


अमेरिका में तो शिक्षकों को और ज्यादा हथियार दिया जा रहा है कि वे ज्यादा ट्रेंड होकर और रिवाल्वर इत्यादि से सुसज्जित होकर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाएं।


संत मुरारी बापू अपनी रामकथा में कह रहे थे कि जिस दिन शिक्षक मुस्कुराने में असमर्थ हो,उस दिन वह विद्यालय से छुट्टी ले ले। अपना अनुभव भी यही कहता है कि विद्यार्थी और शिक्षक का रिश्ता प्रेम का रिश्ता है और प्रेम मिलन में कोई मुस्कुराए बिना कैसे रह सकता है?


लेकिन हमारी तथाकथित- सभ्यता आज किस जगह पहुंच गई कि मुस्कुराने की तो बात छोड़ दीजिए ; शिक्षक दहशत में जी रहा है। इस दहशत के परिवेश में बड़े होते हुए मासूमों के बारे में जरा सोचिए!


यही मैं सोच रहा था कि आंखों से आंसू की एक बूंद ढुलककर धूल में जा मिली-


"आंसू गिरा जो आंख से तकदीर ने कहा


यूं खाक में मिलते हैं देखो आबरूपसंद।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹