परिंदे दाना-पानी छोड़, क्यूं उड़ रहे??
June 4, 2022संवाद
"परिंदे दाना-पानी छोड़, क्यूं उड़ रहे??"
कई दिनों से बोरिया-बिस्तर समेटे हुए सड़क पर आंदोलन कर रहे "कश्मीरी-पंडितों" के सब्र का बांध आखिर टूट गया।
"ऐसे भय के वातावरण में हम नहीं जी सकते और अब अपने एक भी प्रियजन को हम नहीं खो सकते; अतः सामूहिक-पलायन का निर्णय अब हम वापस नहीं ले सकते"- कश्मीरी पंडितों के नुमाइंदे की यह बात एक साथ 'कई यादों को' और 'कई प्रश्नों को' जेहन में खड़ा कर गई।
बचपन में हम किराए के मकान में रहते थे। बाबूजी की छोटी आय से सस्ता और छोटा रूम ही संभव था। फिर भी प्रेम के कारण चचेरे भाई-बहनों के साथ रिश्तेदारों-नातेदारों के लिए भी जगह बन जाती थी। पास-पड़ोस के बच्चों के साथ ही नहीं बल्कि रूम की दीवारों से भी इतना प्रेम हो जाता था कि जब कभी मकान बदलना पड़ता था तो कई रातों तक वे सारी यादें सताया करती थीं। गीली आंखें देखकर बड़े समझाया करते थे कि अपना मकान थोड़े ही था। दिन में उस गली के दोस्तों से मिलने जाता था, तब थोड़ा दर्द हल्का होता था।
तत्त्वज्ञानी समझाते थे कि इतना राग बनाना ठीक नहीं।और मैं वैराग्य के नए संकल्प को भी ले लेता था।नए मकान में नई गली के दोस्तों से फिर प्रेम बढ़ जाता था; तत्त्वज्ञान और संकल्प न जाने कहां गायब हो जाता था।
कश्मीरी पंडितों को तो अपनी जन्मभूमि,अपने पुश्तैनी मकान,अपनी खानदानी यादें, अपने परिवेश व पड़ोसी सबकुछ छोड़कर जाना ही नहीं बल्कि भागना पड़ा है। किराए के मकान बदलने के अपने दर्द के आलोक में आज कश्मीरी पंडितों के दर्द के बारे में जब सोचता हूं तो पता चलता है कि इनका दर्द कितना बड़ा और कितना गहरा है-
जन्नत में जहन्नुम का नजारा क्यूं?
बर्फ से उठ रहा यह शरारा क्यूं??
सरकार द्वारा भरोसा जगाने के सारे प्रयास कश्मीरी पंडितों में क्यों भरोसा नहीं जगा सके?आर्थिक विकास की ओर बढ़ते चरण के बावजूद क्यों घाटी फिर से उजड़ने की ओर बढ़ चली?
सरकार कहती है कि आतंकियों का हमने सफाया कर दिया, इतनी सारी योजनाएं चलाकर कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास करा दिया, निवेशक कश्मीर में पैसा लगाने को और उद्योग खोलने को इतने ज्यादा तत्पर हो गए, अब आमजन में नहीं बल्कि अपराधियों में वहां भय का माहौल है।
लेकिन कश्मीरी पंडितों का अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों के साथ बचे-खुचे सामान लेकर किसी सुरक्षित जगह की ओर निकल जाना; कुछ और कह रहा है।
टीवी डिबेट में सारे दल के प्रवक्ता अपनी पार्टी द्वारा कश्मीरियों के हित में उठाए गए कदमों को गिनाते हैं और कश्मीरी स्वयं को कभी न खत्म होने वाले अंधेरों से घिरा पाते हैं। राजनीतिक-बात और कश्मीरी-जज्बात में कोई संबंध नहीं दिखता। शायर बाकी सिद्दकी के शब्दों में-
"तुम जमाने की राह से आए ,
वर्ना सीधा था रास्ता दिल का।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹