संवाद


"वाद विवाद में आज संवाद कहां?"


गांधी जी कहा करते थे कि बहस करते समय नरम शब्द और अकाट्य तर्क का सहारा लेना चाहिए। आजकल किसी भी बहस में कटु शब्दों और कुतर्कों का ही बोलबाला मिलता है और व्यक्तिगत अपमानजनक टिप्पणियों से हाथापाई की नौबत देखने को मिलती हैं।


एक विवादित बयान हमारे राष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा सकता है; राष्ट्र से प्रेम करने वाले हर नागरिक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए और विशिष्ट पदों पर बैठे लोगों को तो विशेष रूप से इसके बारे में सावधान रहना चाहिए-


एक छोटी सी बात कही थी


क्या-क्या अर्थ निकाले उनने


सब उसमें है उलझ गए अब


क्यों बुने थे , ऐसे जाले तुमने?


बहस में सिर्फ वक्ता के शब्द ही महत्वपूर्ण नहीं होते बल्कि उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है श्रोता द्वारा लिया गया उसका अर्थ । अतः तर्क विषय-केंद्रित होना चाहिए,व्यक्ति-केंद्रित नहीं और विचारात्मक होना चाहिए ; भावनात्मक या उत्तेजनात्मक नहीं।


आस्था से जुड़े विषयों पर बहस से बचना चाहिए। किंतु दुर्भाग्य की बात है कि आजकल 90% से ऊपर बहस आस्था के विषयों पर कराई जा रही हैं। आस्था का तर्क से कोई मेलजोल नहीं बैठता।


फिर डिबेट में ऐसे लोगों को बुलाया जाता है जो दूसरों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं और अपनी बात को उत्तेजनात्मक तथा भावनात्मक ढंग से पेश करते हैं।


इसके पश्चात विवादित बयान सोशल मीडिया पर सब जगह फैलाकर अपनी आस्था के लोगों को लामबंद करने और भड़काने के लिए उपयोग किया जाता है।


अभी तक हमारी शिकायत यह थी कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कुछ विज्ञापन इतने अश्लील बनाए जाते हैं कि परिवार के साथ उसको नहीं देखा जा सकता, अब दुख के साथ यह शिकायत करनी पड़ रही है कि अधिकतर बहस ऐसी उत्तेजनात्मक हो रही है कि स्वयं के साथ भी देखा सुना नहीं जा सकता।


वाद , विवाद के बाद "संवाद" की मंजिल यदि नहीं मिले तो मानना चाहिए कि हमारा मार्ग ही गलत है। 'वाद' बीज है, 'विवाद' वृक्ष है और "संवाद" उस पर खिला हुआ फूल।


शिक्षालयों में वाद-विवाद का आयोजन किया जाता है और पक्ष तथा प्रतिपक्ष दोनों को बेहतर तर्क देने के लिए पुरस्कृत किया जाता है। क्योंकि समस्या के समाधान में दोनों तरफ के तर्क बहुत सहयोगी होते हैं।


किसी भी विषय के अंधकारपूर्ण और प्रकाशपूर्ण पक्ष को जानने के बाद हम अंधकार को कम कर प्रकाश को बढ़ाने में सफल होते हैं।


इंटरनेट के इस युग में हम सब "इंटरकनेक्टेड" भी हैं। अतः इंटर-रिलेशनशिप को प्रभावित करने वाले बयानों से बचना चाहिए।


किसी विषय पर बहस के लिए विषय का चयन , वक्ता की गुणवत्ता और अभिव्यक्ति का ढंग -इन पर गंभीरतापूर्वक विचार- विमर्श करने का यह समय है।


भारतीय दर्शनशास्त्र में आदर के साथ पूर्वपक्ष की बात रखने के बाद तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की परंपरा रही है।--


एक मकान के पीछे वाले भाग में लोगों द्वारा कूड़ा फेंके जाने से परेशान होकर मकान-मालिक ने दीवार पर लिखवा दिया- "यहां कूड़ा फेंकना कानूनन अपराध है।" किंतु इसका कुछ विशेष असर नहीं हुआ।


तब मकान मालिक ने दीवार पर लिखवाया कि - "यहां सिर्फ गधे गंदगी फैलाते हैं।" इस वाक्य से भी कोई विशेष अंतर नहीं पड़ा।


दुर्गंध से परेशान होकर किसी मनोविज्ञान के प्रोफेसर से मकान-मालिक ने पूछा कि अब हम क्या करें? मनोवैज्ञानिक-दार्शनिक ने कहा कि "जगह को साफ-सुथरा करवा कर दीवार पर देव-चित्र लगवा दो।"


ऐसा करने पर मकान-मालिक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उसने देखा कि आते-जाते लोग उस दीवार तरफ सिर्फ सर ही नहीं झुकाते हैं बल्कि कुछ लोग तो अगरबतियां भी जला जाते हैं।


मन कानून से कम आस्था से ज्यादा चलता है। इसलिए हमारे आस्था के केंद्र धर्म-स्थल में जो शिक्षा दी जाती है, उसका अमिट छाप मन पर पड़ता है। उसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि कोई वैज्ञानिक भी अपने इष्टदेव और उपासना-पद्धति के प्रति श्रद्धाभाव रखता है, कोई तर्क नहीं करता-


"वहां का फलसफा है पूर्ण समर्पण


'क्यूं' और 'कैसे' हटाकर तो देखो ;


फिजां में हर सिम्त खुशबू है उसकी


खिड़कियों को जरा खुलाकर तो देखो।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹