बाह्य-पर्यावरण ही नहीं,आंतरिक-पर्यावरण भी विचारणीय
June 12, 2022संवाद
"बाह्य-पर्यावरण ही नहीं,आंतरिक-पर्यावरण भी विचारणीय"
प्रकृति की गोद में महान पुस्तकों की रचना करने वाले देश में नई पीढ़ी के एक हाथ में पौधा होना चाहिए और दूसरे हाथ में पुस्तक ; किंतु दुर्भाग्य है कि उनके हाथों में कहीं पत्थर हैं और तो कहीं तलवार।
"Environment Performance Index"(EPI) में भारत 180 देशों की सूची में अंतिम स्थान पर है। सभी से जुड़ा हुआ सार्वजनिक हित का यह मुद्दा मीडिया में ऐसे छुपाया गया जैसे सफेद शर्ट पर कलम की स्याही का कोई दाग लग जाने पर हम छुपाते हैं। फिर भी यह मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्यावरण-चेतना की जिस ऊंचाई पर भारत का दर्शन है,उस ऊंचाई पर अन्य किसी भी देश का दर्शन नहीं। अतः श्वेत वस्त्र पर लगा हुआ छोटा सा दाग जैसे सारा ध्यान खींच लेता है, वैसे ही मेरा सारा ध्यान "पर्यावरण और भारत" विषय पर केंद्रित हो गया।
यद्यपि भारत सरकार ने इस सूचकांक को अवैज्ञानिक मानते हुए इस पर आपत्ति जताई है, फिर भी बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी इंडेक्स में पीछे रहने पर गंभीर आत्मावलोकन तो होना ही चाहिए। साथ ही डेनमार्क,ब्रिटेन,फिनलैंड जैसे टॉप 3 के राष्ट्रों से कुछ सीखना भी चाहिए।
देश में भी कुछ व्यक्ति और संस्थाएं जो पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रेरणास्पद कार्य कर रही हैं, उनसे जन-जन को तो परिचित कराना ही चाहिए।
तेलंगाना के "दरिपल्ली रमैया" 84 साल की उम्र में भी सब जगह वृक्ष लगाते चलते हैं। अब तक "एक करोड़ पौधे" लगा चुके रमैया को प्यार से लोग "चेतला"रमैया कहते हैं; चेतला का अर्थ होता है "वृक्ष"। वे अपने वाहन पर बीज और छोटे पौधे लेकर प्रतिदिन निकलते हैं।खाली जमीन पर बीज बोते हैं और पौधे लगाते चलते हैं और वे अपने गले में एक वृत्ताकार बोर्ड टांगे रहते हैं जिस पर लिखा है - "वृक्षो रक्षति रक्षित:" अर्थात् वृक्ष की रक्षा करने से हम सुरक्षित हो जाते हैं।
इसी प्रकार से छत्तीसगढ़ के "दामोदर कश्यप" ने वृक्षों की कटाई को रोककर 600 एकड़ के वन को नया जीवन दिया। वे जनजागरूकता द्वारा कई प्रकार के वृक्षों और जड़ी-बूटियों को कटने से बचाने में सफल रहे। अब क्षेत्रवासी "थंगपाली वन" का अपने लिए सदुपयोग ही नहीं कर रहे बल्कि इनसे आय भी कमा रहे हैं।
"एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाए
एक फूल अगर चाहे तो गुलिस्तां बन जाए।"
मीडिया पर चल रहे दिन रात निरर्थक बहसों को देखकर और एक दूसरे के विरुद्ध भड़काऊ वक्तव्यों को सुनकर मेरे मन में ख्याल आया कि यदि पर्यावरण जैसे सार्थक मुद्दों पर इतनी बहस होती और चेतला रमैया तथा दामोदर कश्यप जी जैसे व्यक्तित्वों से दुनिया परिचित होती तो इस चमन की आबोहवा ही कुछ और हो जाती। जिन हाथों में पत्थर हैं,उन हाथों में पौधे होते और जिस जुबान से नफरत के तीर निकलते हैं,उस जुबान से प्रेम के तराने निकलते।
यह ख्याल ही नहीं उठता कि रमैया और कश्यप हिंदू है या मुसलमान। बस इतना ख्याल आता है कि ये लोग ऐसे इंसान हैं जिन्हें देखकर पृथ्वी कह सकती है कि "तू ही मेरा पुत्र है और मैं तेरी माता हूं।"
भारत के पास प्राकृतिक-संसाधन की कमी नहीं है और जन-संसाधन के मामले में तो भारत विश्व में नंबर वन होने जा रहा है। फिर भी यदि हम सबसे अंतिम पायदान पर खड़े हैं तो इसका मतलब है कि संसाधन के सदुपयोग की सोच भटक गई है। सोच का निर्माण शिक्षा करती है किंतु आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सबके लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं।
भारतीय संस्कृति की सोच थी कि यह ग्रह केवल इंसानों का ही नहीं है , पेड़-पौधों से लेकर जीव जंतुओं तक का भी बराबर हक है।
लेकिन "नदियों" को हम माता कहते हैं और सारी गंदगी उसमें ही डाल देते हैं। "पर्वतों" को पिता कहते हैं और उनके अंगों को काटकर रास्ता बना डालते हैं। "वृक्षों" को हम देवता कहते हैं और जंगल के जंगल काटकर कंक्रीट के आशियाने बना लेते हैं। "अन्न" को हम ब्रह्म कहते हैं किंतु भारत में एक व्यक्ति हर साल 50 किलो खाना बर्बाद कर देता है।
सम्यक-शिक्षा और उदार सोच के अभाव में हम अपने ही दोनों हाथों को हिंदू और मुसलमान नाम देकर एक दूसरे से लड़ाने लगे हैं, जबकि असली लड़ाई विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के खिलाफ साथ मिलकर लड़नी चाहिए-
"चलो हम मिलकर एक पेड़ लगाते हैं
तुम जमीन साफ कर जगह बनाओ,
हम पौधे रोप कर नए संबंध बनाते हैं।
चलो हम मिलकर एक पेड़ लगाते हैं।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹