वीडियो गेम की लत से बचाव कैसे?
June 16, 2022संवाद
"वीडियो गेम की लत से बचाव कैसे?"
बच्चों को वीडियो गेम की लत से बचाव के लिए समाज की चिंता चरम पर है किंतु वीडियो गेम बनाने वाले श्रेष्ठ प्रतिभाओं का उपयोग कर रहे हैं ताकि इसे ज्यादा से ज्यादा मनोहारी और आकर्षक बनाया जा सके।
एक तरफ आत्महत्या से लेकर मां की हत्या तक कर देने का जघन्य अपराध इस व्यसन के कारण हो रहे हैं तो दूसरी तरफ मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा एक से बढ़कर एक सुझाव दिए जा रहे हैं किंतु साथ ही भटकाने वाले ऐप्स और वीडियो गेम्स की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।
कोरोना काल में बाहर जाने और खेलने की गतिविधियों पर पूर्ण रोक के कारण बच्चे ही नहीं बड़ों के लिए भी "स्क्रीन की दुनिया" ही सब कुछ हो गई।
खासकर बच्चों के लिए ऑनलाइन एजुकेशन के साथ ऑनलाइन इंटरटेनमेंट ने तो "अति" कर दी।स्क्रीन से आंख हटाते ही बेटे में बढ़ती चिड़चिड़ाहट ने मेरी चिंता बढ़ा दी। रोकने-टोकने पर उसकी बढ़ती उग्रता ने एहसास कराया कि मामला सीमा के बाहर जा रहा है। जब मेरे प्रयास असफल होने लगे तो अचानक दैवकृपा से गली के कुत्तों से उसे प्रेम होने लगा। कुत्तों के प्रति उसका लगाव इतना बढ़ गया कि वीडियो गेम खेलने वाले स्क्रीन टाइम का भी बहुत बड़ा भाग कुत्तों के संबंध में जानकारी जुटाने में वह देने लगा। खान-पान से लेकर कुत्तों के बीमार होने पर उनकी चिकित्सा कराने में उसकी तत्परता ने उसमें कई मानवीय गुण दया, धैर्य इत्यादि विकसित किए।
वीडियो गेम की लत और उसके कारण बच्चे में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति को कम करने में पशु-प्रेम की भूमिका को देखकर मुझे एहसास हुआ कि क्यों ऋषि मुनि लोग प्रकृति की गोद में पशु-पंछियों के साथ रहते थे।
खुले मैदान में गेम खेलने का जो आनंद बच्चों को मिलता था उसकी जगह कृत्रिम मशीनी दुनिया ने "वीडियो गेम" ईजाद कर दिया।ओरिजिनल गेम में और वीडियो गेम में मूलभूत अंतर यह है कि ओरिजिनल गेम में प्रकृति का सान्निध्य मिलता है और ऊर्जा बर्न होती है, जिसके कारण तन और मन दोनों बहुत फ्रेश हो जाता है। वीडियो गेम में अप्राकृतिक वातावरण और ऊर्जा बर्न न होने के कारण स्टैग्नेंट एनर्जी तन और मन को कामुक और हिंसक बनाते हैं।
आखिर उस संतुलन को कैसे साधा जाए कि कमल के समान पानी में भी रहें और पानी गीला भी न कर पाए?
इस प्रसंग में संस्कृत का एक श्लोक बहुत विचारणीय है-
"अत्यासन्ना विनाशाय , दूरस्था: न फलप्रदा:
मध्यभावेन सेवितव्यं राजावह्निर्गुरुर्स्त्रिय:।।"
अर्थात् "अतिनिकटता" विनाश का कारण बनती है और "अतिदूर" होने पर फल नहीं मिलता है। जैसे आग के अत्यंत निकट आने पर जला देती है और अति दूर जाने पर गर्मी नहीं मिलती है। अतः मध्य भाव से आग,राजा,गुरु,स्त्री; इन सभी का सेवन करना चाहिए। आज यही बात मोबाइल के उपयोग के संबंध में भी लागू होती है।
अति से बचकर मध्य में रुकने की कला ज्ञान और ध्यान से आती है। लेकिन आज का युग "ज्ञान" की जगह अतिसूचनाओं का और "ध्यान" की जगह अतिसंपर्क और भीड़ से घिरे होने का है।
इस तकनीक-प्रधान युग की अपनी चुनौतियां है,लेकिन साथ ही अनंत संभावनाएं भी। "सम्यक-ज्ञान" हानि को कम से कम करके लाभ को ज्यादा से ज्यादा प्राप्त करने की कला सिखा देता है। "सम्यक-ध्यान" वह सजगता देता है कि तकनीक साधन ही बना रहे, कहीं साध्य न बन जाए।
लेकिन इतना आत्मनियंत्रण क्या नई पीढ़ी कर पाएगी?
अनुभव बताता है कि पुरानी पीढ़ी ही नहीं कर पाती है तो नई पीढ़ी के लिए यह कैसे संभव है।
यदि मोबाइल के प्रयोग के संबंध में आत्मनियंत्रण का यह प्रयोग बड़े लोग अपने जीवन में उतार कर बच्चों को बताएं तो इसका कुछ असर हो सकता है-
"बड़ा दुश्वार है दुनिया ए हुनर आना भी ;
तुम्हीं से फासला रखना, तुम्हीं को अपनाना भी।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹