अग्निपथ पर आक्रोश की आग
June 19, 2022संवाद
"अग्निपथ पर आक्रोश की आग"
"फादर्स-डे" पर अपने सैनिक पिता को याद करते हुए आज के हालात पर दिल की भावनाओं को रोक नहीं पा रहा हूं।
बाबूजी सेना में थे और कृषि-प्रधान बड़े संयुक्त-परिवार के मुख्य आधार-स्तंभ भी। सेना से रिटायरमेंट के बाद रिजर्व बैंक की छोटी सी नौकरी से अपने परिवार को शहर में रखकर पढ़ा भी लिया तथा खेती से लेकर शादी-विवाह तक की घर की सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह भी कर लिया।
गांव में एक सैनिक का अपना मान- सम्मान था। बाबूजी के दोस्त घर पर आते थे तो बचपन में किसी को हवलदार चाचा तो किसी को सूबेदार चाचा कह कर बड़े इज्जत के साथ हम बिठाते थे। देश की सेवा में सैनिक-पद (हवलदार,सूबेदार इत्यादि)का नाम इतना गौरवान्वित समझा जाता था कि मूल नाम छूट जाता था। इन सैनिक परिवारों के साथ रिश्ते जोड़ना इलाके में गर्व की बात होती थी।
मेरे परिवार की अगली पीढ़ी भी सेना में है, अतः सेना में भर्ती की कामना वाले जवानों के मन में जो आक्रोश की आग सुलग रही है, उसको अपने अनुभव के आधार पर सकारात्मक विवेचन कर सकने की स्थिति में हूं।
अग्निपथ स्कीम के कारण एक तरफ आक्रोशित युवा सरकारी और सार्वजनिक संपत्तियों में आग लगा रहे हैं ; तो दूसरी तरफ हरियाणा के पूर्व सैनिक के 22 साल का बेटा सचिन ओवर-एज होने के चलते आत्महत्या कर लेता है जबकि 2 साल पहले सेना भर्ती के फिजिकल और मेडिकल टेस्ट वह निकाल चुका था,सिर्फ लिखित परीक्षा नहीं हुई थी।
"छोटी सी एक भूल ने सारा गुलशन जला दिया
शहीद होने वाले वीर को आत्मघाती बना दिया।।"
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि जब दिलों मे आक्रोश की आग लगी हो, नई योजना समझ में नहीं आ रही हो,सपनें धूल-धूसरित हुए जा रहे हों और कोई आशा की किरण न दिखाई देती हो तो आगजनी और आत्महत्या क्या संकेत दे रहे हैं?
यह संकेत है व्यवस्था से और स्वयं से विश्वास के उठ जाने का। व्यवस्था की जिम्मेवारी है कि नई चुनौतियों के लिए नई पीढ़ी के मन को शिक्षकों के सहयोग से तैयार करें ताकि विद्रोह न भड़के। विद्रोही मन वाले भावी सैनिकों से यह कहना है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधन के इस दौर में कई परिवर्तन होंगे जिसके लिए हम सबको तैयार रहना पड़ेगा।
और कुछ गलत धारणाएं मन में जड़ें जमाई हुई हैं जो आगजनी और आत्महत्या करवा रही हैं।
यह धारणा कि सरकारी संपत्ति ब्रिटिश-राज की है। स्वतंत्रता काल के आंदोलन के समय में सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता था। वह धारणा अब बदलनी चाहिए। अब भारतीयों का राज है और भारत सरकार की संपत्तियां हैं और इन्हीं संपत्तियों के एक हिस्से से सरकारी वेतन और पेंशन इत्यादि दिए जाते हैं तथा हमारे लिए विकास के सारे कार्य किए जाते हैं।
एक और धारणा भारतीय समाज के मन में बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए हैं कि नौकरी का मतलब स्थायी और सरकारी नौकरी ही होता है।
आज समय बदल चुका है। मेरे महाविद्यालय परिवार के बहुत सारे प्रोफेसर्स की अगली पीढ़ियां सरकारी नौकरियों के मोह से मुक्त होकर निजी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के बल पर ऊंचाइयों पर जा रही हैं।
लेकिन आज भी नौजवानों का बहुत बड़ा हिस्सा अंतिम सांस तक सरकारी नौकरी में येन-केन-प्रकारेण घुस जाने का प्रयास करता है क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा और वैवाहिक रिश्ते के निर्धारण में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
सरकारी नौकरी में प्रतिभा के प्रोत्साहन की कमियों के बावजूद सुरक्षा और स्थायित्व के पीछे भागने वाला परंपरागत मन अकस्मात् बदल नहीं सकता।
अतः निजी-क्षेत्र में बहुत बड़े अवसर को उपलब्ध कराने के साथ सरकारी क्षेत्र में भर्ती की परीक्षाएं पारदर्शी तरीके से और निश्चित समय पर आयोजित करवाकर तय समय सीमा में नियुक्तियां देना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
परीक्षाएं समय पर नहीं होने से और पेपर लीक हो जाने से तथा परीक्षा सेंटर बहुत दूर दिए जाने से नौजवानों के सब्र का बांध टूटता जा रहा है।
निराशा और हताशा के इस वातावरण में युवा घर में पिता के विरुद्ध विद्रोह कर रहा है, बाहर में मां-बाप समझी जाने वाली सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर रहा है और अंततः परमपिता परमात्मा से भी विद्रोह करने के मूड में है और परमपिता से यही पूछ रहा है-
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई,
काहे को दुनिया बनाई
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला,
जिसमें लगाया जवानी का मेला...
यह जवानी घर बसाना चाहती है और घर बसाने के लिए नौकरी की दरकार है; और आज नौजवानों का जीवन बेरोजगार है।
ऐसे विद्रोही मन को सुरक्षा और प्रेम देकर ही वश में किया जा सकता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
'फादर्स-डे' की शुभकामना 🙏🌹