संवाद


"योग है-अनुशासन और मन का नाश"


योग को जन्म देने वाला देश योग के विपरीत रास्ते पर क्यूं जा रहा है? महर्षि पतंजलि ने 'योग' के द्वारा "आत्म-शक्ति" से परिचय कराया, ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से वैज्ञानिकों ने 'प्रयोग' के द्वारा "एटम-शक्ति" से।


एटम-शक्ति का विध्वंस हमने हिरोशिमा में देख लिया किंतु आत्म-शक्ति का सृजन देखना बाकी है। लेकिन आत्मशक्ति का सृजन हम तभी देख सकते हैं जब "योग" हमारे जीवन में उतरे।


योग का अर्थ आसन लगाकर अनुलोम विलोम करना ही नहीं होता है बल्कि जीवन में अनुशासन साधना होता है और मन के पार जाना होता है-


"अथ योगानुशासनम्" -योगसूत्र (१) अर्थात् योग अनुशासन है।


"योगश्चित्तवृत्ति निरोध:" -योगसूत्र (२)अर्थात् मन की समाप्ति योग है।


'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को धूमधाम से मनाया जाएगा किंतु जिस "अनुशासन" और "मन की समाप्ति" की बात पतंजलि अपने 'योग-सूत्र' के प्रथम दो सूत्रों में कह रहे हैं, क्या हमारे जीवन में दिखाई दे रहा है या भविष्य में कभी आएगा?


अनुशासन की कमी के कारण से अरबों-खरबों की संपत्ति में आग लग गई और लाखों यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।अनुशासन शब्द 'शास्' धातु से बना है, जिससे "शिष्य" बनता है। शिष्य का अर्थ होता है सीखने की और होने की क्षमता वाली वृत्ति। जब तक हम किसी सिद्ध-योगी के पास उसके शासन में रहकर उसका अनुगमन नहीं करेंगे, तब तक योग में प्रवेश नहीं हो सकता। किंतु आज सिद्धयोगी है कहां? और सीखने की क्षमता वाली वृत्ति हमारे पास है कहां?


"मन की समाप्ति" को पतंजलि योग कहते हैं किंतु आज मन को मजबूत बनाया जा रहा है; कोई हिंदू-मन मजबूत बना रहा है तो कोई मुसलमान-मन। किंतु पतंजलि का इशारा है, इंसानों को बांटने वाले ऐसे मजहबी मन को समाप्त करने का; क्योंकि यह समाज की देन है। इसे साहिर लुधियानवी ने अपने शब्दों में यों प्रस्तुत किया है-


"अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है


तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है


जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम किया है


उस इल्म का तुझ पर कोई इल्जाम नहीं है।


तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा


तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा।।


आज मन को समाजों के द्वारा जो "इल्म" अर्थात् ज्ञान दिया जा रहा है, वह जोड़ने की जगह बांट रहा है। ईश्वर और अल्लाह के बंदे एक दूसरे के परम-आराध्य का अपमान कर रहे हैं और एक दूसरे के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं।


पतंजलि की नजर में ईश्वर भी एक साधन है -सत्य को प्राप्त करने का। गांधी जी भी यही कहा करते थे -


"ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान"


किंतु हिंदू-मन और मुस्लिम- मन के कारण कई दंगे हुए तथा कट्टर-हिंदू-मन ने सत्य-प्रेम-अहिंसा के पुजारी गांधी की हत्या कर दी।


जब हमारा मन 'सुमन' ही नहीं हो पा रहा है तो पतंजलि के कहे अनुसार मन को समाप्त कर हम "अ-मन" (शांति)को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?


अनुशासन के बिना और मन के नाश के बिना योग कहां??


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


योग दिवस की शुभकामना🙏🌹