संवैधानिक मूल्यों का संकट
June 24, 2022संवाद
"संवैधानिक मूल्यों का संकट"
क्या हमारा लोकतंत्र धनतंत्र हो गया है? ; जहां एक तरफ सेना,शिक्षा,स्वास्थ्य के लिए पैसे का रोना रोया जाता है तो दूसरी तरफ खरीद-फरोख्त के लिए पैसे की कोई कमी नहीं दिखती। महाराष्ट्र की राजनीति में संविधान की शपथ लेने वाले माननीयों द्वारा जो कुछ किया जा रहा है,उसे देखकर पति ने मजाक में पत्नी को "सरकार" कह दिया तो वह भी आगबबूला हो गई-
"पतिदेव दफ्तर से आकर, पत्नी से बोले मुस्कुराकर
ये सजधज और ये श्रृंगार ; क्या इरादा है सरकार?
पति का ये संबोधन सुनकर,पत्नी बोली रुआंसू होकर
आप मुझे चाहे जो भी कहिए, किंतु सरकार संबोधन से मत गहिए।
हम भी अखबार पढ़ते हैं,
'सरकार कैसी होती हैं' सब समझते हैं।
भविष्य में यदि आप हमें सरकार कहके बुलायेंगे
तो याद रखना पछताएंगे
मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा,
पर आपके हाल महाराष्ट्र जैसे हो जाएंगे।।"
सजीवों में मानव सबसे श्रेष्ठतर प्राणी है क्योंकि अन्य जीव-जंतु प्रकृति के अनुसार चलते हैं लेकिन मानव संस्कृति के अनुसार। अतः वेदव्यास ने महाभारत में लिखा- "न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं किंचित्" अर्थात् मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं ; क्योंकि मनुष्य मूल्यों के लिए जीता है।
संस्कृतियों में भी भारतीय सनातन संस्कृति श्रेष्ठतम है क्योंकि हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम राम पिता के द्वारा माता कैकयी को दिए हुए वचन के पालन हेतु राज्य छोड़कर वन की ओर चल दिए। इस मूल्य के कारण अयोध्या का युवराज सदा-सदा के लिए सभी के हृदय का राज जीत लिया। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आदर्श राम जैसे राजा हैं क्योंकि प्रजा के लिए उनके हृदय में अपार करुणा है।
अपने सनातन मूल्य के लिए भारत की वाजपेयी सरकार भी एक वोट के कारण गिर गई लेकिन खरीद फरोख्त नहीं की ; इसी से जनता जनार्दन के हृदयों में अपना अटल स्थान बना गई।
सत्य-प्रेम-अहिंसा के सनातन मूल्यों के अलावा मोहन के पास क्या था जिसके कारण उन्हें राष्ट्रपिता और महात्मा का परम पद मिला।
एक छोटी रेल दुर्घटना पर स्वयं की जिम्मेवारी लेते हुए इस्तीफा देने वाले लाल बहादुर के पास मूल्यों के जीवन के अलावा ऐसा कौन सा आकर्षण था, जो उन्हें भारत के महान लालों (सपूतों) में स्थान दिलाता है।
राजनीति में मूल्यों की स्थापना करने वाले महान सपूतों को अमृत-महोत्सव के पर्व पर हम याद कर रहे हैं ; सत्ता के लिए अपने अंतरात्मा का सौदा करने वाले लोगों को नहीं। संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों द्वारा संवैधानिक मूल्यों को जो ध्वस्त किया जा रहा है, उससे हमारी नई पीढ़ी को क्या संदेश जा रहा है?
"प्राण जाए पर वचन न जाई" के आदर्श वाक्य को बड़े-बड़े मंचों से बड़े ऊंचे स्वर में बोलने वाले महापुरुष ही जब खरीद-फरोख्त के बाजार में अपने तन-मन-प्राण को बेचने और खरीदने को तैयार हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि मूल्यों के साथ राजनीति नहीं की जा सकती?
आज देश का नौजवान प्रश्न पूछने लगा है कि-" मूल्य है कहां?" शिक्षकों को समझ में नहीं आ रहा है कि नई पीढ़ी को हॉर्स- ट्रेडिंग,बाड़ाबंदी जैसे नए आविष्कारों को कैसे समझाया जाए? घोड़ा भी अपने मालिक के बाड़े में रहते-रहते चेतक बन जाता है और जिस इतिहास में दुर्लभ महापुरुषों को स्थान मिलता है,वहां भी आदर से स्मरण के योग्य अपना स्थान बना लेता है।
आज महामारी, महंगाई और रोजगारविहीनता ने तो लोगों को तोड़ा ही है, किंतु उससे भी ज्यादा संविधान की शपथ लेने वाले लोगों की मूल्यविहीनता ने तोड़ा है। जिनके पास पद-प्रतिष्ठा-पैसा इत्यादि सब कुछ हैं, वे भी यदि बिकाऊ हैं, तो मूल्य नामक चिड़िया को सोचना पड़ेगा कि अब वो किस दरख़्त पर बैठे?
मिलिंदपन्हो में सम्राट अशोक अपने राज्य के लोगों से पूछता है कि क्या यहां ऐसा कोई है जो अपने सत्य-निष्ठा से गंगा की धारा उलट दे? पद-पैसा-प्रतिष्ठा वाले सारे लोग हार जाते हैं किंतु बिंदुमती वेश्या गंगा की धारा को उलट देती हैं। सम्राट आश्चर्यचकित होकर पूछता है कि इसका राज क्या है? बिंदुमती जवाब देती हैं कि राजा हो या रंक ; दोनों से मूल्य लेने के बाद अपने तन से सेवा करने में मैं कोई अंतर नहीं करती। अपने व्यवसाय के प्रति इसी सत्यनिष्ठा के कारण गंगा की धारा उल्टा करने में मैं सफल हो गई।
कहानी का संदेश यह है कि किसी मजबूरी में तन बेचने वाली वेश्या भी अपनी अंतरात्मा नहीं बेचती है।
फिर जिनकी कोई मजबूरी नहीं है, वे अपनी आत्मा को क्यों बेच रहे हैं?
क्या सनातन संस्कृति दु:शासन की संस्कृति बनती जा रही है?
अथवा कोई कृष्ण आएगा और चीरहरण रुक पाएगा??
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹