क्या वेतन-पेंशन सिर्फ भार हैं?
July 1, 2022संवाद
"क्या वेतन-पेंशन सिर्फ भार हैं?"
सवाल उठाया जा रहा है कि राजस्थान की तरह अन्य सरकारें भी पुरानी पेंशन योजना को बहाल करती हैं तो राजस्व का 60% हिस्सा 6% लोगों के वेतन और पेंशन पर खर्च होगा तो विकास के लिए क्या बचेगा? राजस्व पर पेंशन का भार कम करने के लिए 2004 में केंद्र सरकार द्वारा "नई पेंशन योजना" लाई गई थी। उस "पुरानी पेंशन योजना" को राजस्थान की सरकार ने पुनः बहाल करने का कदम उठाकर बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है, ऐसा कुछ अर्थशास्त्री बता रहे हैं।
यहां विचारणीय बिंदु यह है कि मुफ्त की बंदरबांट,सब्सिडी,बैंकों में डूबी रकम इत्यादि अनेक वजहों से भी केंद्र और राज्य का खजाना खाली होता है। सिर्फ यूक्रेन में 60,000 भारतीय छात्र मेडिकल की डिग्री लेने के लिए जाते हैं, क्या यह भारतीय धन का बहिर्गमन नहीं है? भारत की प्रतिभाएं विदेशों में अपने कौशल से जो एसेट्स सृजित करती हैं, क्या ब्रेन ड्रेन को रोककर अपने ही देश में इस एसेट्स सृजन का अवसर उन्हें नहीं दिया जा सकता है? देश पर वेतन और पेंशन का भार लगातार बढ़ता जा रहा है, सिर्फ इस मुद्दे को हाईलाइट करके क्या हम विकास के लिए बहुत बड़ी धनराशि बचा लेंगे?
अर्थशास्त्र की मुझे कोई विशेष समझ नहीं है किंतु अर्थशास्त्रियों की ऐसी एकपक्षीय व्याख्या से वेतन और पेंशन पाने वाले नागरिक राज्य पर मात्र भार प्रतीत हो रहे हैं। उनके द्वारा की जा रही सेवाओं और विकास के कार्यों को पूर्णतया नजरअंदाज किया जा रहा है।
इस दृष्टिकोण के कारण स्थायी नियुक्तियां कम होती जा रही हैं और ठेके पर की जाने वाली नियुक्तियां बढ़ती जा रही हैं। अग्निपथ योजना ने तो स्पष्ट कर दिया कि जब सेना का क्षेत्र ही ठेके पर चलाया जा सकता है तो अन्य क्षेत्रों की क्या बिसात! इसके कारण युवावर्ग निराशा और हताशा से भर गया है, जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जा रहा है।
जिस दृष्टिकोण से स्थायी रोजगार कम होने लगें और पेंशन पाने वाले वृद्धजन अपने आप को अनुपयोगी और भार समझने लगें ; क्या नए दृष्टिकोण से इस पर सोचने की जरूरत नहीं है??
सेवा की जरूरत तो देश में बढ़ती जा रही है किंतु सरकारी सेवाओं में स्थाई नियुक्तियों को कम करके पैसा बचाने का उपाय कई दृष्टिकोण से घातक हो सकता है-
(१) अपने मानव संसाधन के सर्वोत्तम उपयोग का अवसर नहीं देने से देश हित में अपने प्रतिभाओं के लाभ से देश वंचित रह जाएगा।
(२) वेतन और पेंशन से जो परिवार चलते हैं और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, उनसे भी राष्ट्र के लिए तैयार होने वाले योग्य नागरिकों का अभाव हो जाएगा।
(३) आधुनिक तकनीकों से कार्य क्षमता निश्चितरूपेण बढ़ती हैं किंतु "मानव-संसाधन" को बिठाकर "मशीन-संसाधन" को बढ़ाने की योजना भारत जैसे देश के लिए क्या सही है? जिन पश्चिमी देशों ने मशीनों का निर्माण किया है, वहां मानवीय संसाधन की कमी थी। इस संदर्भ में यह कहानी विचारणीय है-
एक किसान अपने चार बेटों को भिन्न-भिन्न कामों में लगाए हुए था। कोई कुंए से पानी खींच रहा था तो कोई खेत से खरपतवार हटा रहा था और कोई बैलों को जोतने के लिए तैयार कर रहा था। शहर से आए हुए एक व्यक्ति ने किसान को कहा कि इतनी आधुनिक तकनीकें आ गई हैं कि अपने सभी बेटों को इतनी कड़ी मेहनत से आप बचा सकते हैं-मसलन कुएं से पानी खींचने की जगह ट्यूबवेल और खेत जोतने के लिए ट्रैक्टर इत्यादि से बहुत कम मेहनत में बहुत ज्यादा काम हो सकता है।
किसान ने जवाब दिया कि सारी आधुनिक तकनीकों की जानकारी हमें भी हैं किंतु इन युवाओं को उन तकनीकों के सहारे बेरोजगार कर दिया तो ये विध्वंस के रास्ते पर चले जाएंगे। निश्चितरूपेण आधुनिक तकनीकों के अभाव में थोड़ी आमदनी कम होती हैं किंतु ज्यादा मेहनत करके हमारा परिवार कम आय के बावजूद बहुत ज्यादा खुश हैं।
"उपयोगितावाद" का सिद्धांत पश्चिम की देन है जिसके आधार पर यह सोच आ रही है कि पेंशन पर इतनी राशि क्यों खर्च की जाए जबकि वृद्ध अब अनुपयोगी हो चुके हैं। किंतु क्या आजीवन सेवा के बाद किसी को सुरक्षित वृद्धावस्था से वंचित करना हमारी संस्कृति के मूल्यों के अनुकूल है? कईयों के पेंशन की राशि से पूरे परिवार का घर खर्च चलता है। सिर्फ व्यापारी की तरह सरकार के सोचने का यह तरीका लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत है।
जिस तरह से बच्चे को जन्म देने के बाद उसे सुयोग्य-नागरिक बनाना मां-बाप की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है, उसी प्रकार से मां-बाप के बूढ़े हो जाने पर उन्हें गरिमापूर्ण व्यवहार देना नई पीढ़ी की भी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। सरकार भी परिवार की की तरह होती है; वह न तो योग्य युवाओं को योग्य रोजगार देने से मुंह फेर सकती हैं और न वृद्धावस्था पेंशन को रोककर किसी को गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर सकती हैं।-
"मेहनतों को दो सवेरा और थकन को शाम दो
इस सलीके से सदा हर काम को अंजाम दो।।"
उपयोगितावादी और व्यापारिक-दृष्टिकोण से हटकर लोक कल्याणकारी दृष्टिकोण से सोचें तो वेतन व पेंशन पारिश्रमिक तथा आभार है,.... भार नहीं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹