अच्छे कॉलेज का सपना
July 6, 2022संवाद
"अच्छे कॉलेज का सपना"
12वीं बोर्ड के बाद विद्यार्थी विद्यालय के प्रांगण से निकलकर विश्वविद्यालय के खुले आकाश में उड़ने के लिए उतावले हैं। अच्छा कॉलेज पाना सुनहरे भविष्य की निश्चितरुपेण गारंटी देता है।
आज याद आ रहा है वो दिन जब बोर्ड परीक्षा के बाद मैं पटना विश्वविद्यालय में एडमिशन के सपने देखा करता था। लोग बताते थे कि इस विश्वविद्यालय ने कितने प्रोफ़ेसर ,कितने वैज्ञानिक , कितने आईएएस , कितने कलाकार, कितने खिलाड़ी और कितने बड़े नेता पैदा किए। आज राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार "श्री यशवंत सिंहा जी" जो पहले आईएएस और भारत सरकार के वित्त मंत्री जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं, उसी पटना कॉलेज के छात्र थे।
विश्वविद्यालय के एल्युमनी-दिग्गजों के नाम सुनकर ऐसा लगता था कि मेरा सपना पूरा नहीं होगा-कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। किंतु प्राप्तांक के आधार पर मिस करने के बावजूद क्रिकेट के अचीवमेंट के आधार पर स्पोर्ट्स कोटा से मेरा एडमिशन हो गया। मुझे तो ऐसा लगा मानो नए पंख लग गए; किंतु 85 परसेंट वाले मेरे साथी का एडमिशन नहीं हुआ था और वह हीनभावना का शिकार हो गया।
लेकिन जीवन के अनुभव ने बताया कि "काबुल में भी गधे होते हैं" और गुमनाम कॉलेजों में भी हीरे भरे होते हैं।
जीवन में ऊंचाइयों पर जाने के लिए प्यास, प्रतिभा,परिश्रम, संस्थान,प्रशिक्षण,अवसर,भाग्य इत्यादि अनेक कारकों का योगदान रहता है। साधारण एकेडमिक कैरियर वाले को भी मैंने बड़ों पदों पर जाते देखा और कई टापर्स को भी खाक छानते देखा।
अतः कॉलेज की ग्रेडिंग-सिस्टम को जब कभी मैं देखता हूं तो एक सवाल मन में बार-बार उठता है कि एक तरफ ए ग्रेड के कॉलेज में ए ग्रेड के विद्यार्थी मिल जाएं और सारी सुविधाएं प्राप्त हो जाएं तो अनुकूल हवाओं में अच्छे पाल और पतवार के साथ यह नौका मंजिल की ओर बढ़ रही हैं; दूसरी तरफ सी ग्रेड के कॉलेज में सी ग्रेड के विद्यार्थियों के साथ जरूरी सुविधाओं के अभाव में टूटी फूटी जो नौका मंजिल की ओर बढ़ रही हैं; क्या दोनों के जांचने का पैमाना एक ही होना चाहिए?
महाभारत युद्ध में अर्जुन कर्ण के रथ को अपने बाणों से कई योजन पीछे धकेल देता था; जबकि कर्ण के बाण से अर्जुन का रथ सिर्फ तीन कदम पीछे मुश्किल से जाता था फिर भी कृष्ण कर्ण की तारीफ करते थे। अर्जुन ने पूछा कि ऐसा क्यों? कृष्ण ने कहा कि तेरे रथ पर ऊपर बजरंगबली पहाड लिए बैठे हैं और मैं स्वयं तीनों लोकों का भार लिए बैठा हूं। ऐसे दिव्य रथ को तीन कदम पीछे करना भी अद्भुत हैं।
कॉलेज कोई भी मिले और कैसा भी मिले; इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है अपनी प्यास और परिश्रम। आज इंटरनेट के जमाने में विश्व के प्रसिद्ध संस्थानों ने अपने मैटेरियल नि:शुल्क उपलब्ध करा रखे हैं। किंतु भारी बारिश में भी कोई अपने पात्र को उलटा रख दे; तो इसमें बारिश का क्या दोष?-
"निराश-हताश होती जा रही पीढ़ी
अपनी जीवन दृष्टि पर गौर करे
प्यास जगाए और परिश्रम करे
स्वयं में विश्वास और प्रभु का ध्यान धरे।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹