आत्मावलोकन दिवस
July 10, 2022संवाद
"अस्तित्व पर संकट किंतु आस्था पर चर्चा"
11 जुलाई सिर्फ 'जनसंख्या-दिवस' ही नहीं है बल्कि "आत्मावलोकन दिवस" भी है।मानव-अस्तित्व पर संकट हो और सांप्रदायिक-आस्था की सिर्फ चर्चा हो तो इसका मतलब हुआ कि हम आंख रहते हुए अंधे हैं। राजनीतिक दलों और मीडिया की भूमिका स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान जनजागरूकता में बहुत बड़ी रही थी। सार्थक मुद्दों पर देश में चर्चा शुरू की गई और समन्वय पर जोर दिया गया था जबकि निरर्थक मुद्दे और विभाजनकारी तत्वों को नजरअंदाज किया गया था।
महामारी,महंगाई, बेरोजगारी, वैमनस्य और सारे विवादों के मूल में ध्यान से देखने पर जनसंख्या-विस्फोट है। रहस्यदर्शी ओशो की मानें तो एक तरफ जन्मदर पर अनिवार्य लगाम लगाने की जरुरत है तो दूसरी तरफ वृद्ध हो चुके लोगों को स्वैच्छिक मृत्यु के अधिकार को दिए जाने की जरूरत है। स्वैच्छिक मृत्यु के विकल्प के लिए तैयार होने में भारतीय मन को बहुत वक्त लगेगा किंतु जन्म-दर पर अनिवार्य नियंत्रण के लिए थोड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
आज चारों तरफ भीड़ ही भीड़ दिखाई देती हैं, इसलिए भेड़ किस्म के लोग धर्मांधता का शिकार होकर ऐसे कृत्य कर रहे हैं जो किसी आत्मवान के लिए असंभव है।
आत्मा के जन्म के लिए स्पेस और संसाधन चाहिए। एक छोटे से घर में दर्जन बच्चे वाले परिवार रह रहे हैं और उन्हें न उचित शिक्षा मिल रही है,न समुचित संसाधन। यदि वे किसी आतंकी या अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं तो क्या इस पर विचार किए जाने की जरूरत नहीं है?
किंतु दुर्भाग्य की बात है कि देश इस पर विचार कर रहा है कि किस धर्म की जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। 'हमारा धर्म खतरे में है' इस बात की आड़ में अपनी जनसंख्या बढ़ाने की बात कुछ लोग कर रहे हैं।
डायनासोर की प्रजाति जो हाथी से भी 5 से 10 गुना ज्यादा बड़ी होती थी, अपनी जनसंख्या के कारण विलुप्त हो गई और आज छोटी छिपकली के रूप में बची हुई है। यही संकट आज मानव-अस्तित्व पर है और कारण भी वही जनसंख्या-विस्फोट है।
आश्चर्य की बात है कि शिक्षित और संपन्न घरों में एक या दो बच्चे ही पैदा हो रहे हैं किंतु अशिक्षित और विपन्न घरों में कोई नियंत्रण नहीं है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जिस देश में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज पर निर्भर रहना पड़ रहा है, वह देश आर्थिक ही नहीं बल्कि मानसिक दृष्टि से भी कितना दरिद्र हो चुका है यह सोचने का वक्त है।
जिस सोशल मीडिया का उपयोग वैज्ञानिक चेतना को जागृत करके जनसंख्या को रोकने और युवा शक्ति के सदुपयोग की योजना बनाने हेतु किया जाना चाहिए था, उस सोशल मीडिया का दुरुपयोग आस्था को भड़काने के लिए किया जा रहा है।
सच्ची आस्था किसी के बयान से आहत नहीं होती। रामकृष्ण परमहंस की काली मां के प्रति आस्था को खंडित करने के लिए केशव चंद्र सेन ने अद्भुत तर्क पेश किए किंतु हर तर्क पर रामकृष्ण नाराज होने के बदले वाह-वाह कह उठते। विद्वान केशव को समझ में नहीं आ रहा था कि रामकृष्ण अपनी ईश्वरीय आस्था के प्रति मेरे तर्क के बदले कोई तर्क क्यों पेश नहीं करते, इसके विपरीत वे उन्हें गले लगा लेते हैं। अंत में रामकृष्ण से उन्होंने पूछा तो परमहंस का जवाब था-तेरी प्रतिभा को देखकर मेरी ईश्वर के प्रति आस्था और दृढ़ हो गई क्योंकि ईश्वर कृपा के बिना ऐसी प्रतिभा हो ही नहीं सकती।
जो धार्मिक आस्था अत्यंत निजी मामला है, उस पर अहर्निश सार्वजनिक वाद विवाद हो रहा है किंतु जो जनसंख्या विस्फोट सार्वजनिक अस्तित्व का मसला है, उस पर सिर्फ 11 जुलाई को कुछ औपचारिकताएं पूरी कर दी जाती हैं।
भारतीय संस्कृति कहती हैं कि एक चंद्रमा अंधकार को हर लेता है, हजार तारे नहीं-
"एकश्चंद्र: तमो हंति न च तारागणों अपि च"
किंतु आज भारत "संख्या"(quantity) में विश्वास कर रहा है, "गुणात्मकता"(quality) में नहीं।
जन्म देने के पहले मानव होने के नाते हमें जरूर सोचना चाहिए कि इस शिशु को जीवन कैसा मिलेगा?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹