संवाद


"कहां हैं गुरु?"


एक विद्यार्थी ने प्रश्न किया कि गुरु के नाम पर आजकल आशाराम और राम-रहीम के दर्शन होते हैं, ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि "कहां हैं गुरु?"


इस प्रश्न में मुझे विद्यार्थी की एक तरफ प्रतिभा भी दिखाई दे रही थी तो दूसरी तरफ विद्रोह भी। आजकल प्रश्न पूछने को लोग नास्तिकता मान लेते हैं लेकिन यदि प्रश्न का सम्मान नहीं किया जाए और उसका जवाब देने का प्रयास नहीं किया जाए तो आस्तिकता का कभी जन्म नहीं हो सकता। इसी कारण से नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच का जनरेशन गैप बड़ा होता जा रहा है।


"कहां हैं गुरु?" प्रश्न का उत्तर तभी मिलेगा जब इसके दूसरे पहलू की भी खोज की जाए। वह दूसरा पहलू है- "कहां है शिष्य?"


नरेंद्रनाथ दत्त को एक प्रश्न ने इतना बेचैन कर दिया कि वे रात में गंगा पार करके महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के पास पहुंच गए और पूछा- "क्या आपने भगवान को देखा है?" संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर उनकी बेचैनी उन्हें रामकृष्ण परमहंस के पास ले गई।


इतिहास ही नहीं जर्रा जर्रा गवाह है कि इस योग्य-शिष्य को योग्य-गुरु मिल गया जिसने नरेंद्र को विवेकानंद बना दिया-


"गुरु शिष्य का यह शुभ नाता, सोचो पावन है कितना


हिमगिरी के शिखरों से निकले गंगा मां के जल जितना


इस नाते की मर्यादा को निभा सकें हम कुछ ऐसे


गुरुवर रामकृष्ण बन जाएं ,शिष्य विवेकानंद जैसे।।"


सबसे महत्वपूर्ण है दृष्टिकोण ।आज भी जिसके पास सीखने की कला है, उसके लिए हर व्यक्ति और हर अभिव्यक्ति गुरु हैं। खेल,पढ़ाई, कला,व्यवसाय या अध्यात्म के क्षेत्र में आज भी जो ऊंचाइयों पर उड़ रहे हैं, उनके परों को खोलने और उड़ने की कला सिखाने वाले कोई गुरु ही हैं।


गुरु पूर्णिमा तो याद दिलाता है कि कभी भारत आकाश की ऊंचाइयों को चूमा था। आज यदि हमारा हृदय-कमल कीचड़ से सना है तो- "इसमें दोष किसका है?" इस प्रश्न को गहराई से शिष्य भी सोचे और गुरु भी सोचे।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


जीवन की अंधेरी रात में राह दिखाने वाले गुरुओं को शत-शत नमन


गुरु पूर्णिमा की शुभकामना 🙏🌹