सर तन से जुदा
July 20, 2022संवाद
"सर तन से जुदा"
रात मैंने एक सपना देखा।एक राजा की तबीयत बहुत खराब हो गई। उसका अंत उसे नजर आने लगा। सारे दरबारी ही नहीं ,राज्य का हर नागरिक भी चिंतित होने लगा। राजा की उम्र बहुत कम थी और वह बहुत ज्यादा लोकप्रिय था। उसकी संवेदनशीलता और सहृदयता के किस्से दूर-दूर तक प्रचलित थे।
इस रहस्यमय बीमारी के सामने सारे चिकित्सक हार चुके थे। अंतिम आशा के रूप में महामंत्री द्वारा एक रहस्यदर्शी को ढूंढकर राज दरबार में लाया गया । उसने राजा से अंतरंग वार्ता की। राजा की एक ही ख्वाहिश थी कि मरने के पहले उसे परमात्मा का दर्शन हो जाए। इस लोक में प्राप्त करने योग्य जो कुछ था ,उसने प्राप्त कर लिया था किंतु परलोक की चिंता उसे सता रही थी।
रहस्यदर्शी ने दरबारियों की बैठक बुलाई और राजा के सामने कहा कि आपकी बीमारी भी सही हो सकती है और आपको परमात्मा का भी दर्शन हो सकता है किंतु एक शर्त पर। राजा सहित सारे दरबारियों ने कहा कि वे किसी भी शर्त को पूरा करने के लिए तैयार हैं; बस आप जल्दी से शर्त बताएं।
रहस्यदर्शी ने कहा कि आज के कुछ महीनों के बाद नवरात्र और रमजान का शुभ दिन आएगा और राजा को उस दिन स्वयं अपने हाथों अपनी तलवार से एक बच्चे का "सर तन से जुदा" करना होगा। शर्त सुनते ही कुछ देर के लिए सन्नाटा हो गया और रहस्यदर्शी शुभदिन को आने की बात कह कर चला गया।
शर्त राजा के धार्मिक-स्वभाव के प्रतिकूल था। दरबारी राजा को समझाने लगे कि आपका जीवन बहुत महत्वपूर्ण है और शर्त के पूरा होते ही आपको दिव्य-धर्म की प्राप्ति भी हो जाएगी अर्थात् भगवान के दर्शन भी हो जाएंगे। राजा बहुत बड़े धर्म-संकट में पड़ गया। राज्य की जनता भी शर्त को पूरा करने के लिए कहने लगी।
राजा बहुत एकांत रहने लगा था। एक तरफ रहस्यमय बीमारी का 'भय' उसे सता रहा था तो दूसरी तरफ भगवान के दर्शन का 'लोभ' भी।
आखिर नवरात्र व रमजान का शुभ दिन आया और राजा के धर्म की परीक्षा की घड़ी भी। रहस्यदर्शी दरबार में प्रकट हुआ और दरबारियों के द्वारा एक अनाथ बच्चे को लाया गया। दरबारियों ने कहा कि इस बच्चे के आगे पीछे रोने वाला भी कोई नहीं है; अतः हे राजन्! इसका "सर तन से जुदा" करके शर्त पूरी कर दें।
राज्य की जनता भी इकट्ठी हो चुकी थी और राजा पर शर्त को पूरा करने का दरबारियों का भी भारी दबाव था; उसके भय और लोभ भी सामने खड़े थे।
किंतु राजा ने अपने हाथ में पकड़ी तलवार से बच्चे को काटने की जगह उस अनाथ बच्चे को अपने गले से लगा लिया।
हर कोई आश्चर्यचकित था कि राजा ने इतनी बड़ी मूर्खता क्यूं की?
रहस्यमय बीमारी से मुक्त होने का और भगवान के दर्शन करने का स्वर्णिम अवसर उसने क्यूं गवां दिया?
किंतु अचानक राजा का निर्बल शरीर बलवान हो चुका था और स्वर्णिम आभा उसके चेहरे पर चमक रही थी, मानो वह साक्षात् देवता हो गया हो।
रहस्यदर्शी ने कहा कि राजा की रहस्यमय बीमारी भी खत्म हो चुकी है और उसे भगवान का दर्शन भी प्राप्त हो गया है।
लोगों ने पूछा कि राजा ने तो शर्त ही पूरी नहीं की; फिर वह कैसे निरोगी हो गया और देवता के समान दिव्य भी?
रहस्यदर्शी ने हंसते हुए जवाब दिया -- "क्यूंकि राजा का ध्यान इतने दिनों से अपनी बीमारी से हटकर एक बच्चे पर चला गया था और वह बच्चे के प्रति प्रेम के कारण अपने भय-लोभ से ऊपर उठ गया था। इस आत्मजागरण के कारण उसे 'स्व' का नहीं "पर" का जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दिया।
सपना टूटते ही सच्चे-धर्म के एहसास से हृदय रोमांचित हो गया और मेरे भाव शब्दों में यूं प्रकट हुए-
"महफूमे-सदाकत की अनुभूति होगी
लबों से हलाहल लगाकर तो देखो।
धर्म की राहें हैं आसान कितनी
हुसैन सी बलि चढ़ाकर तो देखो।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹