संवाद


"शादी:ना बाबा ना"


"नौकरी नहीं तो शादी नहीं" की बढ़ती सोच ने एक नई सामाजिक और नैतिक समस्या राष्ट्र के सामने खड़ी कर दी है। हमारी परंपरा में शादी का संबंध प्रत्यक्ष रूप से उम्र से या अवस्था से होता था, नौकरी से नहीं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की शादी के संबंध में जारी ताजा रिपोर्ट भारतीय संस्कृति की नींव को हिलाने वाली है। इस रिपोर्ट के अनुसार 26 फ़ीसदी युवक और युवती शादी नामक संस्था को ही नकार रहे हैं। युवा-वर्ग का सबसे बड़ा प्रश्न आज यह है कि-


घर बसा तो लूं लेकिन घर बसाने का साजो-सामान कहां है?


प्यार व सुकून से भरा दिल और रोटी,कपड़ा,मकान कहां है??


पश्चिमी देशों में शादी को महत्वहीन मानने की प्रवृत्ति उनकी संस्कृति का हिस्सा है किंतु भारतीय संस्कृति की आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थ-आश्रम सबसे प्रमुख और शेष तीनों आश्रमों का आधार है।


हाल के वर्षों में इस गृहस्थ-आश्रम को इनकार करने वालों में 21 फ़ीसदी से अचानक 26 फ़ीसदी का उछाल भारतीय समाज और परंपरा के लिए भारी खतरे की घंटी हैं। जारी रिपोर्ट में आंकड़ें तो दिए गए हैं, किंतु कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है।


बढ़ते "लिव इन रिलेशनशिप" और "बलात्कार" की घटनाएं अपने परिणामों के आधार पर बता रही हैं कि मानव की मूल प्रवृत्ति को समझने में कहीं चूक हो रही हैं।


पश्चिमी संस्कृति मानती है कि आदम और ईव के पाप का फल मनुष्य है किंतु पूरब की संस्कृति काम को देव ("कामदेव") मानती है,पाप नहीं। अतः धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूपी पुरुषार्थ-चतुष्टय में "काम" आधारभूत है और अभिनंदनीय भी। 16 संस्कारों में विवाह संस्कार सर्वप्रमुख है जिससे सृष्टि का चक्र आगे बढ़ता है।


लेकिन "अर्थ" के बिना गृहस्थ-आश्रम को नहीं चलाया जा सकता। इसलिए पुरुषार्थ-चतुष्टय में काम के पहले अर्थ को रखा गया है। अर्थ के द्वारा ही विभिन्न कामनाओं की पूर्ति मानव करता है। हमारी संस्कृति की गहरी दृष्टि यह है कि अर्थोपार्जन और कामसेवन धर्मानुकूल होने चाहिए तभी मोक्ष रूपी मंजिल को प्राप्त किया जा सकता है। अर्थात् "धर्म" इस जीवन रूपी मंदिर का नींव हैं और "मोक्ष" शिखर।


लेकिन भ्रष्टाचार और अनैतिक धंधे द्वारा कुछ लोगों ने अपने हाथों में अर्थ का जरूरत से ज्यादा केंद्रीकरण कर लिया है। इसके कारण असमानता इतनी बढ़ गई कि कुछ लोग ज्यादा खाने से मर रहे हैं तो कुछ लोग खाने के बिना।ऐसी व्यवस्था में शेष सर्वसाधारण लोगों के लिए अर्थोपार्जन मुश्किल हो गया।


जब व्यक्ति अपना ही पेट नहीं भर पा रहा तो परिवार का पेट कैसे भरेगा? उसकी स्वाभाविक परिणति विवाह संस्था के इंकार के रूप में सामने आ रही है। और काम जो सशक्ततम-मूल-प्रवृत्ति है,अपनी तृप्ति के लिए स्वच्छंद रास्ते ढूंढ रही हैं।


युवाओं की आलोचना की जा रही हैं कि वे पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में स्वच्छंद जीवन जीना चाह रहे हैं और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचना चाह रहे हैं। यह पूरा सच नहीं है।


पूर्ण सत्य यह है कि सरकार और समाज भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं।


सरकार की जिम्मेवारी है कि सबको काम दे। लेकिन बेरोजगारी आज चरम पर है।


फिर लचर शिक्षा व्यवस्था से निकले युवाओं के बारे में कहा जाता है कि वे किसी काम के लायक नहीं हैं, उनके पास डिग्री तो है किंतु हुनर नहीं है।


हकीकत तो यह भी है कि जिनके पास डिग्री और हुनर दोनों हैं, हम अपने देश में उनका भी सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। भारतीय प्रतिभाएं विदेशों के विकास भवन में नींव की ईंट साबित हो रही हैं।


धर्म,जाति इत्यादि अनेक आधारों पर बंटा हुआ यह समाज दहेज प्रथा और लिंग-असमानता जैसी अगणित कुरीतियों का शिकार है।


'संयुक्त परिवार' की परंपरा पर गर्व करने वाला यह समाज 'एकल परिवार' तो दूर "दांपत्य" को भी नहीं बचा पाएगा; शादी से इनकार उसी दिशा में बढ़ता कदम है।


इसके मूल कारण में बढ़ती आबादी और घटते संसाधन के साथ उत्तरदायित्वविहीन राजनीतिक व्यवस्था और उदासीन समाज है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹