लिंग-निरपेक्ष पदनाम की जरूरत
July 31, 2022संवाद
"लिंग-निरपेक्ष पदनाम की जरूरत"
माननीया President महोदया चूंकि महिला हैं,अतः उनके साथ "राष्ट्रपति" शब्द पुल्लिंगवाची होने के कारण कुछ लोगों के अनुसार उपयुक्त प्रतीत नहीं होता किंतु स्त्रीलिंगवाची शब्द "राष्ट्रपत्नी" तो अन्य कुछ लोगों के विचार में अनुपयुक्त होने के साथ अशोभन भी लगता है।
माननीया श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी जब भारत की प्रथम महिला प्रेसिडेंट बनी थीं, उस वक्त भी यह सवाल उठा था कि क्या "राष्ट्रपति" संबोधन एक महिला के लिए उचित होगा या पदनाम को बदलना ठीक रहेगा?
आज राष्ट्रपत्नी शब्द के संबोधन पर गहरी आपत्ति खड़ी की गई है और माफी मांगने के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
कुछ लोग यह भी प्रश्न उठा रहे हैं कि एक महिला के लिए "राष्ट्रपति" शब्द तो स्वीकृत हैं और गरिमापूर्ण भी किंतु "राष्ट्रपत्नी" शब्द पूर्णतया अस्वीकृत ही नहीं बल्कि अपमानजनक भी; ऐसा क्यों?
कहीं यह पुरुष प्रधान समाज की एक पक्षीय सोच तो नहीं? क्योंकि "पति" शब्द को तो महिला के लिए भी स्वीकार किया जाए और "पत्नी" शब्द पर एतराज किया जाए ,यह सूक्ष्म दृष्टि रखने वालों को समझ नहीं पड़ता।
महिला सशक्तिकरण के इस दौर में लिंग निरपेक्ष शब्दों की दरकार बहुत बढ़ गई है।
'राष्ट्रपति' की जगह यदि "राष्ट्राध्यक्ष" शब्द का व्यवहार चलन में होता तो slip of tongue या wrong intention की गुंजाइश ही नहीं बचती। स्कूलों में प्रधानाचार्य और कॉलेज में प्राचार्य पद पर किसी महिला के आसीन होने पर प्रधानाचार्या और प्राचार्या शब्द का व्यवहार उस पद के लिए सहज होता है।
क्रिकेट संस्था "मेलबोर्न क्रिकेट क्लब" (MCC) ने क्रिकेट में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से CRICKET से जुड़ी कुछ शब्दावली में परिवर्तन करके यह शुरुआत की है -जैसे बैट्समैन और बैट्सवुमैन की जगह "बैटर" शब्द के इस्तेमाल को उन्होंने स्वीकार किया।
समय और परिस्थिति के अनुसार बहुत सारी चीजों में इस पितृसत्तात्मक समाज में बदलाव होना चाहिए। बदलाव पर स्वस्थ चर्चा स्वस्थ समाज की पहचान है। इसमें परंपरा और आधुनिकता में संघर्ष चलेगा।यह संघर्ष शुभ हो सकता है, यदि परंपरा बदलाव को और आधुनिकता आधारभूत मूल (root)के महत्त्व को स्वीकार करने को तैयार हो जाए।
केरल के एर्नाकुलम जिले के वलयानचिरंगारा सरकारी स्कूल ने लड़के लड़कियों दोनों के लिए "जेंडर न्यूट्रल यूनिफॉर्म" अपनाकर लैंगिक समानता व्यवस्था को मजबूत करने की सकारात्मक कोशिश की है।
कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा विश्व के विभिन्न हिस्सों में सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्म के माध्यम से जेंडर न्यूट्रल क्लासरूम ,जेंडर न्यूट्रल कार्यालय आदि की मांगें उठाई जाती रही हैं। ऐसे में ताजा विवाद "जेंडर न्यूट्रल शब्दों" के शोध को बढ़ाने की चुनौती है।
वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय को "तृतीय पंथ" का दर्जा देते हुए उन्हें भी समाज का अहम हिस्सा माना।इसके साथ ही समाज के प्रगतिशील वर्ग द्वारा 'जेंडर न्यूट्रल शब्दों' को तरजीह देने की मांग भी उठने लगी। क्योंकि कल पुलिस विभाग में अगर कोई ट्रांसजेंडर की नियुक्ति होती है तो उसे पुलिसमैन कहना भी गलत होगा और पुलिसवुमेन भी।
वर्ष 2008 में यूरोपियन यूनियन पहला अंतरराष्ट्रीय संगठन बना जिसमें तटस्थ शब्दों वाली बहुभाषी निर्देशिका को अपनाने की पहल की गई।
तेजी से बदलते आज के हालात में विश्वविद्यालयों के लिए "लिंग निरपेक्ष शब्दों के शोध" को प्राथमिकता देना समाज के समावेशी विकास की दिशा में एक अच्छा कदम होगा।
"सरस्वती के दरबार में विवाद भी बोध बन जाता है
राजनीति का शोर,यहां का शोध बन जाता है।।"
राजनीतिक-जगत में जो विवाद का विषय होता है,वह शिक्षा-जगत में शोध का विषय बन जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹