आजादी का अमृत कहां है?
August 4, 2022संवाद
"आजादी का अमृत कहां है?"
कृष्ण की आत्मा आज यही पूछती होगी कि "हे पार्थ! कहां अर्पित होना था और कहां अर्पित हो गए?"
आज के पार्थ को सरस्वती की आराधना में रत किंतु लक्ष्मी के प्रति अर्पित देखकर जेहन में बार-बार यही एक सवाल उठता है कि क्या आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में यही अमृत हमने प्राप्त किया हैं? बाहर से तो हम कहने मात्र को आजाद हो गए हैं किंतु अंदर से तो वासनाओं की गुलामी की जंजीरों में बंधे हुए हैं। शिक्षामंत्री की नीति और नीयत यह है तो देश की दशा और दिशा क्या होगी?
संस्कृत का एक श्लोक है-
"गुणैरुतमतां याति नोच्चैरासन संस्थिता
प्रासादशिखरस्थो अपि काक:किं गरुडायते।।"
अर्थात् गुणों से उत्तमता आती हैं,ऊंचे आसन पर बैठ जाने से नहीं। ऊंचे महल के शिखर पर बैठ जाने से कौवा गरुड़ नहीं हो जाता।
पुलिस गिरफ्त में शिक्षामंत्री को देखकर बच्चे ने कहा कि इन्हें देखने से ज्यादा बेहतर है कि Animal planet लगा कर जानवरों को देखो, जो जंगल में कितने आजाद होकर घूम रहे हैं।
बड़ों को अपमान करने वाली बच्चे की ये बातें शूल की तरह चूभी किंतु जब एक तरफ एनीमल प्लैनेट चैनल पर जानवरों को आजाद घूमते-दौड़ते देखा और दूसरी तरफ अपनी कामनाओं के गिरफ्त में ऊंचे आसन पर बैठे इंसानों को बंदी देखा तो तुलना का जगत शुरू हो गया। जानवरों के जगत में कोई शिक्षा नहीं है और न शिक्षामंत्री, अतः जानवर प्रकृति में जीते हैं किंतु आज का तथाकथित शिक्षित-मानव संस्कृति की बात करता है लेकिन विकृति में जीता है।
न्यूज़ चैनल वाले भी इनके असीमित लोभ के साथ अवैध संबंधों के ऐसे राज खोलते हैं और इतने मसालेदार तरीके से परोसते हैं कि अपने बच्चे-बच्चियों के साथ उस समाचार को देखकर आंखें शर्म से नीचे झुक जाती हैं।
आखिर बच्चे ने एक सवाल पूछ ही लिया-"कामिनी-कंचन का परित्याग करने वाले "रामकृष्ण परमहंस" और युवावस्था में सर्वस्व समर्पण करके संन्यासी बनने वाले "स्वामी विवेकानंद" की शिक्षाओं का आजादी के 75 वर्षों के बाद यह हश्र क्यों हुआ? जीवन बनाने वाले और नैतिक पाठ पढ़ाने वाले शिक्षा जगत में जब शिक्षकों की भर्ती में घोटाले होते हैं तो यह शिक्षा हमें कहां ले जाएगी?
शिक्षक होने के बावजूद मुझे बच्चे के सीधे-सादे सवाल का उत्तर देने के लिए कोई जवाब नहीं सूझा।
लेकिन आंखों के सामने यह दिखाई देने लगा कि आज परीक्षा में पेपर लीक रोकने के लिए लड़कों के फुल शर्ट उतरवाकर अर्धनग्न रूप में परीक्षा रूम में भेजना पड़ता है ,लड़कियों के मंगलसूत्र से लेकर ओढ़नी तक उतरवाने पड़ते हैं और शिक्षकों के मोबाइल जब्त कर सीसीटीवी कैमरों से सब पर निगरानी रखनी पड़ती है ; अर्थात् मशीन पर भरोसा बढ़ा है,मानव पर नहीं। आखिर शिक्षा का कौन सा बीज हमने बोया हैं, जिसका फल इस रूप में सामने आ रहा है?
आज शिक्षा और परीक्षा की दुर्दशा से चारों तरफ अंधकार ही अंधकार दिखाई दे रहा है किंतु राम सुभग और भगवती यादव जैसे कुछ प्रकाश की किरणें चमक उठती हैं ,जो आशा जगा जाती हैं। इंच भर जमीन के लिए जान देने लेने वाले जमाने में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के इन दो बेपढ़े-लिखे लोगों ने भावी पीढ़ियों की शिक्षा के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन दान में दे दी ताकि गांव में स्कूल खुल सके।
यदि मुझसे कोई पूछे कि आजादी का अमृत कहां हैं?
तो मेरा इशारा होगा बेपढ़े-लिखे किंतु हृदय से सुसंस्कृत राम और भगवती जैसे उन आमजनों की ओर जो भावी पीढ़ियों की शिक्षा के लिए अपना सर्वस्व दान कर देते हैं।
"अमृत के नाम पर जब जहर बिक रहा हो
तालीम ऐसी चाहिए जिसे सब दिख रहा हो।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹