गरल को अमृत बनाने की कला
August 14, 2022संवाद
"गरल को अमृत बनाने की कला"
आजादी के अमृत महोत्सव के क्षण में ७५वें स्वतंत्रता दिवस के शुभ-अवसर पर एक बात हम सभी भारतीयों को स्पष्ट दिखाई देनी चाहिए कि हमारे महापुरुषों के पास गुलामी का गरल पीने की कला ऐसी थी कि उससे आजादी का अमृत भावी पीढ़ियों के लिए वरदान में प्राप्त हुआ। कृतज्ञ राष्ट्र के एक नागरिक के रूप में अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर हृदय भावविभोर हो जाता है,जिन्होंने इतने कमाल से विषपान किया कि आज वे अमर हो गए-
"बढ़ती चली गई उमर हर एक घूंट पर,
पीया है उनने विष भी इतना कमाल से।।"
मैं सोचता हूं कि धर्म,समाज-सुधार,शिक्षा, विज्ञान, कला इत्यादि अनेक क्षेत्रों में विवेकानंद, गांधी , सीवी रमन,टैगोर, अंबेडकर, नेहरू,सुभाष, पटेल,बिस्मिल,अशफाकउल्ला , भगत सिंह जैसी अनेक महान आत्माओं को जन्म देने वाला कालखंड क्या अमृत-काल नहीं था?
भले ही इतिहासकार उसे पराधीनता का काल मानते हों किंतु ऐसी स्वाधीन आत्माओं को जन्म देने वाले कालखंड को मैं अमृतकाल ही मानूंगा। सद्गुणों को बढ़ाने वाली चुनौतियां किसी अमृत से कम नहीं और दुर्गुणों को बढ़ाने वाली समृद्धियां किसी गरल से कम नहीं।
महापुरुषों की तपस्या और त्याग के कारण जो स्वतंत्रता रूपी अमृत हमें प्राप्त हुआ था, 75 वर्षों में अपने भोग और लोभ के कारण वह अमृत हमने कहीं खो दिया हैं-
"गरल पी के पुरखों ने जो अमृत हमें दिया,
नई नस्ल पूछ रही है- वह कहां खो दिया?"
लगता है अमृत को पीने और पिलाने की कला हमें नहीं आया; अन्यथा एक तरफ अमृत की झलक दिखाता हुआ "शाइनिंग इंडिया" और दूसरी तरफ गरल का एहसास कराता हुआ "धूमिल भारत" की असमानता की भयावह तस्वीर इस तरह सामने नहीं आती,जिस तरह आज आ रही है।
आखिर क्या कारण है कि भारत की प्रतिभाएं विदेशों में चली जाती हैं और वहां उस देश के विकास में अमूल्य योगदान दे जाती हैं? आखिर क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के मानक में हमारा देश शीर्ष पर पहुंच जाता है और प्रेस की आजादी व लोकतंत्र के मानक में सबसे पीछे रह जाता है? आखिर क्या कारण है कि गगनचुंबी अट्टालिकाओं के बगल में बसी हुई झोपड़ियों का कद बढ़ नहीं पाता? आखिर क्या कारण है कि हमारे शिक्षा संस्थान सिर्फ डिग्री बांटने वाले केंद्र बनकर रह गए हैं? आखिर क्या कारण है कि राष्ट्रीय-चरित्र नहीं बन पा रहा है और राष्ट्रीय-नेतृत्व नहीं उभर पा रहा है?
यदि इन प्रश्नों पर गहराई से और ईमानदारी से प्रत्येक भारतीय चिंतन करे तो इस चिंतन रूपी सागर-मंथन से जरूर अमृत प्राप्त होगा जिससे अमृत-महोत्सव सार्थक सिद्ध होगा-
"मृत्योर्मा अमृतम् गमय!"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
अमर स्वतंत्रता-सेनानियों को नमन 🙏🌹