संवाद


"बंधनमुक्त अमृत-मन की खोज"


आजादी के 75 वर्षों के बाद भी जब कहीं जाति के नाम पर, तो कहीं धर्म के नाम पर; कहीं लिंग के नाम पर, तो कहीं वर्ण के नाम पर ; कहीं भाषा के नाम पर तो कहीं क्षेत्र के नाम पर मानव के द्वारा ही मानव पर अत्याचार की सीमा को पार करते हुए देखता और सुनता हूं तो आजादी के अमृत महोत्सव की उमंग चिंता में तब्दील हो जाती है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब किसी शिक्षा-संस्थान का नाम भेदभाव के केस में आता है। यह चिंता अवसाद में बदल जाती है जब किसी शिक्षक पर मासूम की हत्या का आरोप लगता है और उसके मूल कारण में भेदभाव की मानसिकता का पता चलता है-


"फिर रहा है आदमी भूला हुआ , भटका हुआ


एक न एक लेबल हर एक माथे पे है लटका हुआ


आखिर इंसान तंग सांचों में ढला जाता है क्यूं?


आदमी कहते हुए अपने को शरमाता है क्यूं??"


स्वतंत्रता दिवस की अमृतमयी प्रातः बेला में अपने तिरंगे को फहराने के लिए अपने शिक्षा-संस्थान में शिक्षक के रूप में तन का उपस्थित होना भी जरूरी है किंतु मन ने बगावत कर दी है क्योंकि एक शिक्षक के हाथों एक मासूम ने दम तोड़ दिया है। शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूं अपने को मानव कहने पर; शिक्षक कहना तो बहुत दूर की और बहुत ऊंची बात है। अंतरात्मा बार-बार पूछ रही है- "यदि शिक्षा-संस्थान में शिक्षक की पिटाई से किसी मासूम की मौत हो जाए और वह भी मूल में जातिगत द्वेष हो तो देश का भविष्य क्या होगा? यदि शिक्षक का मन ऐसा है तो आमजन के मन के बारे में क्या कहा जाए??"


"सा विद्या या विमुक्तये"


अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति प्रदान करे.... हर प्रकार के बंधन से..... चाहे वह जाति का हो या धर्म का,लिंग का हो या क्षेत्र का, भाषा का हो या वर्ण का....


हम शिक्षक यह पढ़ाते हैं कि महात्मा बुद्ध ने एक बालिका से पानी मांगा तो बालिका ने कहा कि- मैं नीची जाति की हूं। महात्मा बुद्ध ने कहा कि पुत्री! मैंने पानी मांगा है, जाति नहीं।


15 अगस्त 1947 को आजादी के जश्न में गांधी क्यों शामिल नहीं हुए, उसका कारण मुझे आज हृदय से अनुभव हो रहा है। दिल्ली से दूर वे दंगे की आग को नोआखली में बुझा रहे थे। उत्साह और हंसी होने की जगह गांधी के चेहरे पर आजादी की सुबह अवसाद और रुदन था। गांधी की महानता इस बात में छिपी है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज पर देश की आजादी के जश्न में शामिल होने से उन्होंने दूरी बना ली।


किसी ने सदा प्रसन्न रहने वाले गांधी से पूछा कि बापू! अपनी मेहनत से मिली हुई आजादी के दिन भी आप हंसते क्यों नहीं?...... महात्मा का जवाब था.... किसी कवि के शब्दों में.....


"जन्म लेते ही जो अभावों की चक्की में पिसे


जान पाए न जो बचपन , यहां कहते हैं किसे


जिनके हाथों ने जवानी में भी पत्थर ही घिसे


और बुढ़ापे में जिनके नासूर के मवाद रिसे


उन यतीमों को कलेजे से लगा लूं तो हंसूं


अभी हंसता हूं, जरा मूड में आ लूं तो हंसूं।।


जिनकी हर सुबह सुलगती हुई यादों में कटी


और दोपहरी सिसकते हुए वादों में कटी


शाम जिनकी नए झगड़ों में, फसादों में कटी


रात बस खुदकुशी करने के इरादों में कटी।


ऐसे बदनसीबों को मरने से बचा लूं तो हंसूं


अभी हंसता हूं ,जरा मूड में आ लूं तो हंसूं।।


मेरी भी अंतरात्मा यही पूछ रही है कि-


"अमृत महोत्सव के जश्न को कैसे मनाऊं?


आंखों में आंसू हैं,हंसी होठों पर कैसे लाऊं??"


"हर घर तिरंगा" अभियान को राजनीति सफल बना सकती है किंतु "हर दिल तिरंगा" अभियान को तो शिक्षा ही सफल और सुफल बना सकती है। लेकिन व्यावसायिक-शिक्षा नहीं ; मानव का चरित्र निर्माण करने वाली आध्यात्मिक-शिक्षा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


अमृत-महोत्सव और स्वतंत्रता-दिवस की शुभकामना।


मन जातिधर्म आदि बंधनों से मुक्त हो यही मनोकामना।।🙏🌹