संवाद


"कृष्ण पूर्णावतार क्यूं?"


छात्र-संघ-चुनाव के वातावरण में एक विद्यार्थी ने पूछा - "आज की गंदी राजनीति में भी क्या कृष्ण चुनाव लड़ते?"


प्रश्न यद्यपि गैर-गंभीर था किंतु मैंने पूरी गंभीरता के साथ उस पर विचार करना शुरू किया।


आज की राजनीति निकृष्टतम लोगों के हाथों में सरकती जा रही हैं क्योंकि उत्कृष्टतम लोग बुरे लोगों के लिए राजनीति की जगह छोड़कर अन्यत्र रुख कर लेते हैं।


कृष्ण को हमारी संस्कृति में पूर्ण-अवतार माना गया है। क्योंकि कृष्ण जीवन को उसके सभी रंगों में जी लेने की कला जानते हैं। कृष्ण जीवन की किसी भी चुनौती से नहीं भागते। जो व्यक्ति महाभारत से नहीं भागा ; वह आज की गंदी राजनीति और चुनाव से क्या भागता! जबकि गीता पढ़ने वाले कृष्ण प्रेमी भी अधिकतर मामले में पलायनवादी ही हैं।


किंतु कृष्ण को लड़ाई की भाषा पसंद नहीं। अतः वे "चुनाव लड़ते" नहीं बल्कि "चुनाव करते।"


आजकल कोई भी नेता बोलता है कि 'चुनाव लड़ रहा हूं' तो उसके लिए चुनाव एक लड़ाई बन जाती है। वह स्वयं को और अपने समर्थकों को भी विरोधी से लड़ने के लिए तैयार करता है।


जबकि हकीकत यह है कि हम जनता को या मतदाता को "चुनाव करना होता है" और नेता को "चुनाव में जाना होता है।"


संपूर्ण जीवन एक चुनाव है। कदम कदम पर जीवन में हमें कई विकल्पों में से एक बेहतर विकल्प का चुनाव करना होता है।


यदि कृष्ण को किसी संगठन या पार्टी का चुनाव करना पड़ता तो वे अपने विवेक से बेहतर का चुनाव करते।


शब्द को ब्रह्म कहा जाता है- "शब्द ब्रह्म:" । जैसे पानी में तेल की एक बूंद डालें तो वह फैलता जाता है; उसी प्रकार एक गलत शब्द "चुनाव लड़ना" अशुभ को फैलाता चला जाता है और एक सही शब्द "चुनाव करना" शुभ को फैला देने की सामर्थ्य रखता है।


"चुनाव लड़ना" जैसे शब्द को प्रयोग में रोकने की जरूरत है; इसकी जगह पर "चुनाव करना" जैसे शब्द को प्रयोग में लाना चाहिए।


इलेक्शन में खड़े दो नेताओं में से दोनों को लोग वोट देते हैं किंतु 19 वोट पाने वाला हार जाता है जबकि 20 वोट पाने वाले को विजयी घोषित किया जाता है। "चुनाव लड़ने" जैसे शब्द के आलोक में हारा हुआ अपमानित महसूस करता है और विजयी उम्मीदवार अहंकार से भर जाता है।


वास्तविकता यह है कि दोनों में अंतर मामूली सा है।यह मामला उन्नीस-बीस का है। लोकतंत्र में जिसकी आस्था हो उसके लिए दोनों उम्मीदवारों में संबंध दुश्मनी का नहीं सहयोग का होना चाहिए। दोनों को कम या अधिक मतदाताओं का समर्थन मिला है;अतः दोनों को उनके हित में मिलकर काम करना चाहिए।


लेकिन लड़ाई का शब्द और भाव प्रबल होने के कारण दोनों में एक प्रकार की दुश्मनी सी ठन जाती हैं। तभी तो आज नेता और उनकी पार्टियां एक-दूसरे को मिटाने में लगी हुई हैं।


कृष्ण का व्यक्तित्व प्रेरणा देने वाला है क्योंकि भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथी विपक्ष में हैं फिर भी उनके साथ कृष्ण के बहुत हार्दिक और घनिष्ठ संबंध हैं। इसके बावजूद इन तीनों महारथियों के मारे जाने में कृष्ण अपनी व्यूह-रचना करते हैं ताकि बेहतर सत्य जीत सके।


महाभारत के समय में बलराम तटस्थ हो जाते हैं और तीर्थयात्रा पर चले जाते हैं। बड़े भाई बलराम के द्वारा लाख समझाने पर भी कृष्ण उस रास्ते को नहीं अपनाते क्योंकि तटस्थ होना कृष्ण को प्रिय नहीं है। वे जीवन के हर संघर्ष में शामिल होना चाहते हैं; लेकिन रंज के साथ नहीं बल्कि सहर्ष।


अतः कौरव और पांडव में से स्वयं एक बेहतर पक्ष पांडव का साथ देते हैं और वह भी बिना अस्त्र-शस्त्र के। आश्चर्य की बात कि अपनी अस्त्र-शस्त्र युक्त नारायणी-सेना को कौरव के पक्ष से लड़ने की अनुमति भी दे देते हैं।


हमारी संस्कृति ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अंशावतार माना और कृष्ण को पूर्णावतार क्योंकि कृष्ण बांसुरी भी बजा सकते हैं और सुदर्शन भी उठा सकते हैं; स्नान करती गोपियों का वस्त्र लेकर पेड़ पर भी चढ़ सकते हैं और सभा में चीरहरण पर वस्त्र-प्रदान करने आ भी सकते हैं; स्वयं को पांडव के पक्ष में भी रख सकते हैं और अपनी सेना को कौरव के पक्ष में भी; रण छोड़ कर कभी भाग भी सकते हैं और कभी महाभारत भी करा सकते हैं अर्थात् जीवन के सभी पक्ष उनके लिए सर्वस्वीकार हैं।


लोकतांत्रिक-चेतना का निर्माण आज सबसे जरूरी है जिसके लिए कृष्ण-चेतना कहती हैं-


"निश्चिंत रहो जब तक मैं खड़ा हूं तिमिर के तट पर


कभी भी रोशनी को खुदकुशी करने नहीं दूंगा।


तुम्हें आश्वस्त करता हूं,पदार्थों के छली-युग को


कभी भी आस्था का शील मैं हरने नहीं दूंगा।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं 🙏🌹