सद्भावना का मंत्र है-forgive and forget
August 20, 2022संवाद
"सद्भावना का मंत्र है-forgive and forget"
क्षमाकरण और विस्मरण इन दो पंखों के बदौलत सद्भावना के आकाश में कोई उड़ पाता है। अधिकांश जन तो दुर्भावना के कीचड़ में रेंगते हैं क्योंकि अपमान के पलों को हृदय में संजोए रहते हैं और बदले की आग को जलाए रखते हैं।
सद्भावना दिवस हमारे हृदय में सद्भावना का बीज बोने में सबसे ज्यादा प्रमाणिक-दिवस है क्योंकि यह उस भारत रत्न "स्व.राजीव गांधी" की याद में मनाया जाता है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की बलि दी और उनके परिवार ने उनके हत्यारों को माफ करके अद्भुत मिसाल पेश किया और संदेश दिया-
"Forgive others not because they deserve forgiveness but because you deserve peace."
परमात्मा से प्रार्थना है कि यह बलिदान और सद्भावना हम सभी के हृदयों में उतरे ; लेकिन-
"अभी भावना भारती कब बनी है?
अभी आग है,आरती कब बनी है??"
अमृत महोत्सव को सार्थक बनाने के लिए प्रतिशोध की आग में जी रहे जगत को प्रेम की आरती में तब्दील करना है ; हृदय में भरी हुई घृणा-क्रोध की भावना को करुणा की भारती में।
'अंधे का पुत्र अंधा होता है' जब द्रौपदी ने हंसते हुए कहा था तो द्रौपदी की हंसी को और कथन को दुर्योधन भूल न सका और बदले की आग में जलता रहा। उसका बदला भरी सभा में चीरहरण के रूप में सबके सामने आया। इसका अंतिम परिणाम महाभारत के रूप में प्रकट हुआ।
दूसरी तरफ गौतम पर किसी ने थूका तो अपनी चादर से थूक पोंछकर उन्होंने कहा कि कुछ और कहना है। जबकि उनका शिष्य आनंद क्रोध से आग बबूला हो गया और बुद्ध से उस व्यक्ति को ठीक करने की आज्ञा मांगने लगा। बुद्ध ने आनंद को कहा कि उस व्यक्ति की गलती की सजा तू क्यों भुगत रहा है? उसके हृदय में दुर्भावना थी तो उसने थूक कर उसे प्रकट किया; मेरे हृदय में सद्भावना थी तो थूक को पोंछकर मैं अपनी शांति और आनंद में लीन हो गया।
सद्भावना दिवस एक चिंतन का दिवस है- आप बुद्ध (गौतम)की तरह जीना चाहते हैं या बुद्धू (दुर्योधन)की तरह? हृदय रूपी मंदिर हर को मिला हुआ है किंतु सद्भावना रूपी गुलाब उसमें बहुत कम लोग खिला पाते हैं; अधिकतर लोग तो दुर्भावना रुपी कांटे ही बोए चले जाते हैं।
लेकिन आज भी "क्षमा करो और भूल जाओ" के मंत्र को जीवन में उतार कर अपने पति और पिता के हत्यारों को माफ करने वाले व्यक्तित्व हमारे बीच में हैं; उनसे प्रेरणा लेकर हर हृदय में इस सद्भावना का बीज यदि बोया जाए तो हर तरफ प्रेम और शांति के फूल खिल उठेंगे।
आज जाति,धर्म,क्षेत्र,लिंग,भाषा के आधार पर इंसानों को बांट कर एक दूसरे के प्रति हृदय में दुर्भावना भरी जा रही है जिसका परिणाम मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है।
बांटने की जगह जोड़ने हेतु सद्भावना-यज्ञ चलाकर "हर घर तिरंगा" अभियान से आगे बढ़कर हर दिल में तिरंगे को बसाया जा सकता है-
"यूं तो मेरा तन माटी है,तुम चाहो कंचन हो जाए
यूं तो मेरा मन पावक है,तुम चाहो चंदन हो जाए।।"
दुर्भावना के कारण प्रतिशोध की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति से देश अशांति और विनाश की ओर जा रहा है। सद्भावना के द्वारा प्रेम और करुणा की मन:स्थिति बनाकर ही हम देश को शांति और विकास की ओर ले जा सकते हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
सद्भावना दिवस की शुभकामना 🙏🌹