लिंगदोह समिति के सख्त प्रतिबंधों में चुनाव कैसे लड़ूं?
August 21, 2022संवाद
प्रश्न:सर! "लिंगदोह समिति के सख्त प्रतिबंधों में चुनाव कैसे लड़ूं?" -छात्रनेता
प्रिय विद्यार्थी!
तटबंधों को तोड़ कर जब पानी बहने लगता है तो बाढ़ से विनाश हो जाता है; लेकिन पानी कितना भी ज्यादा हो,बांध बनाकर उससे बिजली उत्पन्न की जा सकती है व नहरें निकाली जा सकती हैं , तब उसी पानी से विकास हो जाता है। जिन्हें तुम 'प्रतिबंध' कहते हो,उन्हें शिक्षा-जगत "मर्यादा" कहता है। इन मर्यादाओं का निर्माण लिंगदोह समिति के विशेषज्ञों के सुझावों पर माननीय न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर हुआ है।
मर्यादाओं के स्वीकार करने से राम का जीवन और ज्यादा विकसित हुआ तथा गौरवपूर्ण हुआ तभी तो उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा जाता है। यह मर्यादा सभी के लिए हैं। अतः अभी मर्यादाओं पर सवाल उठाने के बजाय मर्यादाओं के पालन की मानसिकता का निर्माण करो।
धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव से राजनीति का अपराधीकरण होने के कारण छात्रसंघ चुनाव पर 2005 से 2010 के बीच प्रतिबंध था। लिंगदोह समिति की मर्यादा में फिर से छात्रसंघ चुनाव शुरू हुए।
तुम्हारी मुख्य चिंता है कि महज 5000 रु. की राशि में चुनाव कैसे लड़ा जा सकता है?
महाविद्यालय परिसर में वाद विवाद और संवाद के द्वारा अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इतनी ही राशि को विशेषज्ञों और न्यायालय ने पर्याप्त माना। मुझे भी लगता है कि जिस देश में अधिकतर विद्यार्थियों के पास फीस भरने के पैसे नहीं है, उस देश में छात्र-नेता पैदा करने के लिए राशि को न्यूनतम ही रखना चाहिए।
हस्तलिखित प्रचार सामग्री की ही इजाजत है। इससे कम से कम खर्च में अपनी क्रिएटिविटी ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की चुनौती मिलती है।
साधन और साध्य की पवित्रता पर गांधी जी ने सबसे ज्यादा जोर दिया।
आज भारत का लोकतंत्र धनतंत्र में तब्दील होता जा रहा है। ऐसे में गरीबों का नेतृत्व कैसे उभरेगा?
धन से प्रचार तो बहुत तेजी से हो जाता है और बहुत ज्यादा हो जाता है किंतु प्रचार से नेतृत्व की आत्मा पैदा नहीं होती। स्वतंत्रता आंदोलन के सारे नेता पहले समाज सुधारक की भूमिका में उभरे और लोगों का दिल जीता। फिर समाज ने उन्हें अपना समर्थन दिया, जिसके कारण वे राजनीतिक नेता के रूप में उभरे।
शिक्षा जगत धरातल से आकाश की ओर जाने का कदम दर कदम रास्ता बताता है; आकाश से अचानक उतर कर नेता बनने पर उसमें जड़ें होती ही नहीं। जिसकी जड़ नहीं हो उस पौधे पर न फूल आएंगे,न फल आएंगे। अतः आज गांधी,नेहरू,पटेल,सुभाष, भगत सिंह जैसे नेता कितने पैदा हो रहे हैं?
"अपने जड़-मूल से पता अगर जुदा हो जाएगा
हादसों का फिर शुरू एक सिलसिला हो जाएगा।"
जमीन से जुड़े नेताओं के अभाव में आज देश में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। उस संकट को दूर किया जा सकता है यदि जनबल के आधार पर और अपने चरित्रबल के आधार पर अपनी जड़ों से जुड़ कर नेता काम करें ।
जन सरोकार के मुद्दे पर गहन अध्ययन ,फिर विचार करना और फिर लोगों को समझाना और अंत में उसके लिए सामूहिक रूप से संघर्ष करना हमारे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं की जीवन शैली थी।
आज लंबे और कड़े संघर्ष का विचार गायब हो गया है। बाहरी धनबल से तुम्हारा प्रचार तो जल्दी हो जाएगा और ज्यादा हो जाएगा लेकिन तुम्हारे नेतृत्व की आत्मा मर जाएगी। जिससे धन लोगे, उसके मन के अनुसार तुम्हें चलना होगा।
"बेवजह कोई मेहरबां नहीं होता
जमीं के बिना आसमां नहीं होता।"
आगे चुनाव तुम्हारा है ; बस शिक्षा-जगत से दिया गया विचार हमारा है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे 🙏🌹