संवाद


"व्यक्तिगत-आक्षेप से बचकर रचनात्मक-आलोचना करने वाला छात्र-नेता कैसे बनें?"


छात्र संघ चुनाव के दौरान विश्वविद्यालयों से जो तस्वीरें आ रही हैं, उसको देखकर जन-गण हैरान है और शिक्षक-मन बहुत परेशान। छात्र नेताओं की आग को रोशनी में तब्दील करने के लिए शिक्षकीय-वृत्ति के लोगों को आगे आना चाहिए अन्यथा इस आग में बहुत कुछ जलने वाला है।


लिंगदोह समिति व्यक्तिगत आक्षेप से बचकर नीतिगत आलोचना की बात कहती हैं।


भावी नेता के लिए चुनाव एक मौका होता है-समस्या को गहराई से समझने का, उसके समाधान के लिए कार्य योजना बनाने का और उस कार्य-योजना के प्रति लोगों में विश्वास जगाने का।


बहस के दौरान अपनी नीतियों और नीयत को सबसे अच्छा बताने का हर उम्मीदवार द्वारा प्रयास किया जाता है। क्योंकि इसी के द्वारा ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सकता है। इसके लिए प्रतिपक्षी की नीतियों और कार्यों की भी गहरी जानकारी होनी चाहिए और अपनी कार्ययोजना को भी बेहतर ढंग से रखने की शब्द-सामर्थ्य और सलीका होना चाहिए।


गांधी जी कहा करते थे कि बहस करते समय नरम शब्दों का और कठोर (अकाट्य) तर्कों का सहारा लेना चाहिए। इसके लिए उन्होंने सत्य-प्रेम-अहिंसा का मार्ग चुना। अपने सत्य को प्रेम से कहने के बल पर गांधीजी एक तरफ अंग्रेजों के विरुद्ध देशवासियों को संगठित कर सके और दूसरी तरफ किसी बड़ी कार्रवाई के लिए अंग्रेजी सरकार को मौका न मिल सके इसका भी ध्यान रख सके।


वाणी से दूसरे को घायल करने वाले और पुलिस की लाठी से स्वयं घायल होने वाले छात्र नेताओं को देखकर मुझे उस मोहन की याद आई जो वाणी की मर्यादा और संयम के कारण महात्मा बन गए। सहनशीलता और स्वाध्यायशीलता के कारण एक तरफ गांधीजी देशवासियों में लोकप्रिय होते जा रहे थे और दूसरी तरफ अंग्रेजी सरकार को देशद्रोह का आरोप लगाने का भी कोई मौका नहीं दे रहे थे। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि गांधीजी के ह्रदय में किसी के प्रति घृणा नहीं थी। अतः वे आग उगले बिना अपनी बात प्रेम से कह जाते थे-


"वाणी बड़ा अनमोल है , जो कोई बोलै जानि


हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि ।।"


आजकल टीवी पर अधिकतर बहस देश के मूल मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा,स्वास्थ्य इत्यादि पर न होकर किसी के द्वारा बोले गए असंसदीय शब्दों पर होती हैं। असंसदीय शब्दों की सूची लंबी होती जा रही हैं, संसद व देश का समय बर्बाद होता जा रहा है और समाज में जहर घुलता जा रहा है। मूल कारण है कि हमने सत्ता-घृणा-हिंसा का मार्ग चुन लिया और सत्य-प्रेम-अहिंसा का मार्ग छोड़ दिया।


सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक-कार्यक्रमों की आलोचना होनी चाहिए। इस आलोचना से बेहतर कार्यक्रम बनाने में मदद मिलती है। सार्वजनिक-नीतियों की आलोचना की जगह व्यक्तिगत जीवन की निंदा से दुश्मनी बढ़ जाती है और जनकल्याण से ध्यान हट जाता है।


आलोचना और निंदा का रूप-रंग तो एक जैसा लगता है किंतु आत्मा बहुत भिन्न होती है क्योंकि (१) आलोचना होती है सत्य के आविष्कार के लिए जबकि निंदा होती हैं पर के तिरस्कार के लिए। (२) आलोचना होती है किसी को जगाने के लिए और निंदा होती है किसी को मिटाने के लिए। (३) आलोचना होती हैं प्रेम के कारण निंदा होती है घृणा के कारण।


जब लोग सहनशील थे और स्वाध्यायशील थे तब आलोचना तो सहर्ष स्वीकार करते ही थे, निंदा को भी गौर से सुन लेते थे। तभी कबीर ने खुली घोषणा की-


"निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय


बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय।।"


किंतु आज लोग सार्वजनिक आलोचना से भी तिलमिला जाते हैं और व्यक्तिगत जीवन की निंदा पर तो मानहानि का मुकदमा दर्ज करा देते हैं।


नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने भारत को विश्वगुरु बनाया था जहां वाद विवाद से आगे बढ़कर संवाद में तब्दील हो जाया करता था। प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में जानने वाले विदेशी आज हमारे विश्वविद्यालयों में मूल्यों की अवधारणा लेकर यहां पढ़ने आते हैं; आज के चुनावी दृश्यों को देखकर वे सोचते होंगे-


"दूर से आए थे साकी सुनके मैखाने को हम


पर तरसते ही रहे अफसोस पैमाने को हम।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


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