छोटी बातों पर फांसी क्यों लगा रहे मासूम?
August 25, 2022संवाद
"छोटी बातों पर फांसी क्यों लगा रहे मासूम?"
मां बाप के द्वारा जिद पूरी न करने पर बच्चे के द्वारा जान देने की खबरें प्रायः समाचारपत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं किंतु जब यह पास-पड़ोस में घटती हैं तो बहुत गहरा प्रभाव छोड़ जाती हैं। और जब यह घटना परिवार में घटती है तो दिल को पूरी तरह से तोड़ जाती है।
महाविद्यालय परिवार में घटी ऐसी एक घटना की खबर मेरे प्रोफ़ेसर साथी ने कल मुझे दी कि --"एक प्रोफ़ेसर साथी के बेटे ने फांसी लगा ली।"
खबर का मन के अंदर पहुंचना और मेरे आंसुओं का सैलाब बाहर आना इतनी तेजी से घटा कि मानो दिल ने अपनी मनमानी शुरू कर दी हो।
खबर देने वाले साथी को भी और स्वयं मुझे भी ऐसे जज्बाती दृश्य की उम्मीद न थी। ऐसा लगा कि माही बांध के 16 गेट खोल दिए गए हों।
तब दिमाग में एक विचार उत्पन्न हुआ कि खबर मात्र सुनने वाले की हालत ऐसी होती है तो उस बाप पर क्या बीती होगी जिसने अपने लाडले अरमान को फंदे पर लटका देखा होगा!
कुछ देर के बाद बुद्धि ने जब काम करना शुरू किया तो कारणों की खोजबीन शुरू हुई। कुछ महीने पहले और एक प्रोफेसर के बेटे ने फांसी लगा ली थी। इन बेटों की किस्मत में बड़ा मकान था, हर प्रकार का साजो-समान था और हर जिद को पूरा करने वाला मां बाप का प्यार से भरा हुआ बलिदान था।
लेकिन क्या जिंदगी में किसी की भी हर जिद कोई भी पूरी कर सकता है?
नामुमकिन है ...किंतु आंखों के तारे और दिल के दुलारे के लिए मां- बाप का हृदय ऐसा होता है कि चांद को भी तोड़ने के लिए एक बार अपनी आंखों को और हाथों को उठा देते हैं। क्योंकि एकल परिवार के इस जमाने में उनके लिए जीवन की धुरी और सब कुछ वही है।मानो "ना" ( No)का इस अस्तित्व में कोई स्थान ही नहीं। और यही बच्चा जब घर के बाहर की दुनिया में निकलता है तो "हां" (Yes) बहुत मुश्किल से सुनने को मिलती है।
एक जमाना था जब हम सब बाप के घर में होने पर डरते हुए घर में प्रवेश करते थे और कोई बात मां के द्वारा ही उन तक पहुंचाने की हिम्मत करते थे और उस पर से "हां" बहुत मुश्किल से सुनने को मिलती थी। …..आज बाप डरते हुए घर में प्रवेश करता है और बच्चे के शब्दकोश में "ना" (No) है ही नहीं- "अभी और यहीं" (now and here) की उसकी आदत पड़ चुकी है-
"मैं तो वही खिलौने लूंगा, मचल गया दीना का लाल
जिसको लेकर खेल रहा ,राजकुमार उछाल उछाल।"
हमारी परवरिश में कहीं भूल हो रही है। अन्यथा हमारे दो प्रोफ़ेसर साथियों को अपने ही मासूमों के हाथों जिंदगी भर न भूलाया जाने वाला जख्म नहीं मिलता।
राजा दशरथ भी राजमहल से अपने कलेजे के टुकड़ों को निकालकर वन की चुनौतीपूर्ण जीवन के लिए विश्वामित्र के साथ भेज देते हैं। और आज के मां-बाप वन में भी महल की सुख-सुविधाओं का अपने लाडले के लिए इंतजाम सबसे पहले कर देते हैं।
बिट्स पिलानी में अपने बच्चे को रखने गया था तो हर मां-बाप के द्वारा मांग की गई थी कि-"यहां की गर्मी को देखते हुए अपने बच्चों के लिए ए सी लगाने की हमें इजाजत दी जाए।"
संस्था-प्रधान का जवाब था कि "यहां सुविधा के लिए नहीं,शिक्षा के लिए बच्चे आए हैं" इसलिए कूलर से ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा।
ए सी में ही जीने वाले बच्चे के लिए यह बहुत बड़ी सजा थी क्योंकि अमीरी की कब्र पर पनपने वाली गरीबी बहुत जहरीली होती है।किंतु कुछ महीनों के बाद ही सारे बच्चे वहां एडजस्ट हो गए।
"जिंदगी को समग्रता में स्वीकार करने का और उसके अनुसार ढलने ढालने का प्रयास होना चाहिए , अपनी जिद के अनुसार नहीं।" कोई "मोबाइल" के कारण तो कोई "बाइक" के कारण ,कोई "कपड़े" के कारण तो कोई "पिज्जा बर्गर" के कारण अपने आप को फांसी के फंदे पर लटका देता है तो उसे मालूम ही नहीं कि "जीवन क्या है?" और "यह ऊपर वाले का कितना बड़ा वरदान है?"
हमारे ऋषि कहते हैं कि जीवन एक यज्ञ है लेकिन सिर्फ उनके लिए जो इसमें स्वयं की आहुति देने को तैयार हैं। जीवन एक संघर्ष है लेकिन सिर्फ उनके लिए जो इसको सहर्ष स्वीकार करते हैं।
अभाव और संघर्ष , नकार और दुत्कार ; जिस जीवन में नहीं हो, उस जीवन में कुछ कमी रह जाती है। उसको जंगल में भेजकर इन अनमोल हीरों से परिचय कराना होगा। दिनकर जी के शब्दों में-
कंकरियां जिनकी सेज सुघर, छाया देता केवल अंबर
विपदाएं दूध पिलाती हैं , लोरी आंधियां सुनाती हैं
जो लाक्षागृह में जलते हैं , वे ही शूरमा निकलते हैं।।
'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹