संवाद


"हार को स्वीकारना और जीत को पचाना"


हार को स्वीकार करने की कला जो पीढ़ी भूल जाती है, उसको जीत को पचाने की कला भी बहुत मुश्किल से आती है। लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला छात्र संघ चुनाव में उन्माद और संघर्ष का जो नजारा देखने को मिल रहा है, उसमें बदलाव तभी आ सकता है जब समाज का सहयोग मिले। लेकिन जब समाज ही किसी भी कीमत पर प्रत्याशी की जीत के लिए आक्रामक नारों का और आक्रामक व्यवहारों का समर्थन कर रहा हो तो फिर शिक्षा जगत के लिए बहुत बड़ी चुनौती हो जाती है।


अमेरिकी राष्ट्रपति लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक के पास एक पत्र लिखा था जिसमें निवेदन किया था कि- आदरणीय शिक्षक!मेरे बेटे को जीतने की कला अवश्य सिखाना; लेकिन हो सके तो यह भी सिखाना की हार को गले कैसे लगाया जाता है।


आज सोच बदल गया है। आज का पिता ही नहीं बल्कि पूरा परिवार और समाज अपने बेटे को जिताने के लिए हर प्रकार के षड्यंत्र में मदद करने लगा है।


75 वर्षों में भारत के लोकतंत्र के इतिहास का सबसे सुखद व अमृत पहलू यह रहा है कि हारने वाली सरकारों ने जीतने वाले विपक्ष के लिए सत्ता हस्तांतरण करने में कभी कोई बाधा नहीं डाली।


इसलिए छात्र संघ चुनाव का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि हार को स्वीकार करना और जीत को पचाना नई पीढ़ी को आया या नहीं आया


इसमें सबसे बड़ी भूमिका शिक्षा की है किंतु व्यक्ति,परिवार और समाज की भूमिका को कम नहीं माना जा सकता।


निष्पक्ष और निर्विवाद चुनाव कराने पर भी जब हारने वाले उम्मीदवार द्वारा धांधली का आरोप लगाया जाता है और समाज उस बात का समर्थन करने के लिए आगे आता है तो यह चिंता और चिंतन की बात है।


संघर्ष का तरीका यदि संवैधानिक हो और नैतिक हो तो आप हार कर भी जीत जाते हैं। किंतु असंवैधानिक और अनैतिक तरीके से यदि कोई विजयी भी होता है तो वह चुनाव जीतने के बावजूद जीवन हार जाता है।


मूल्यों का संकट आज लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट है। चुनाव आपको करना है कि मूल्यों की राजनीति के लिए छात्र संघ चुनाव में भाग ले रहे हैं या मूल्यविहीन राजनीति के लिए


गांधी,अंबेडकर, नेहरू,सुभाष, पटेल और भगत सिंह जैसे अनगिनत महापुरुषों ने मूल्यों की राजनीति के लिए हर प्रकार की कुर्बानी दी।


पुरखों की इस निशानी को बचाने में ही आज की जवानी की सार्थकता है-


"बेताब नई नस्ल है पहचान को अपनी,


पुरखों की निशानी के लिए सोचता है कौन?


मुफलिस की जिंदगानी के लिए सोचता है कौन?


उन आंखों के पानी के लिए सोचता है कौन?"


इन प्रश्नों का उत्तर कल चुनाव परिणाम के बाद आने वाले दृश्यों से ही मिल सकेगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹