Class-urgent हो election-urgent की तरह
August 30, 2022संवाद
"Class-urgent हो election-urgent की तरह"
Election-urgent में पिछले 10 दिनों से विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के प्रोफेसर से लेकर Peon तक समस्त स्टाफ अहर्निश लगे हुए थे। भारी तनाव और दबाव के बीच चुनावी कार्य को अंजाम तक पहुंचाया गया। मकसद एक था- शैक्षिक वातावरण को नई ऊंचाइयां देना।
इस मकसद की प्राप्ति तभी हो सकती है जब election-urgent के तर्ज पर class-urgent के अभियान को सफल बनाया जाए। प्रतिभा तो क्लास में संवारी जाती है और भविष्य का निर्माण शिक्षक के द्वारा होता है। खुशी इस बात की है कि क्लास के महत्व को नई पीढ़ी के छात्र-नेताओं ने अपनी आवाज में बुलंद करना शुरू कर दिया है।
राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र नेता ने अपने निर्मल विचारों की प्राथमिकता में सबसे पहले क्लास को रखा और सभी प्रोफेसरों को संदेश दिया कि कल से ही मैं प्रत्येक क्लास में अपने शिक्षकों को देखना चाहता हूं ताकि एक भी दिन किसी विद्यार्थी का खराब न हो। इसके लिए अन्य सभी गैर शैक्षणिक कार्यों से शिक्षकों को मुक्त करना होगा ताकि वे अपना समय और शक्ति विद्यार्थियों को पढ़ने-पढ़ाने में लगा सकें।
मैंने जिस कॉलेज में चुनाव प्रभारी का दायित्व निभाया,वहां 93% से ऊपर मतदान हुआ और इस हेतु परिवार व समाज ने दूर-दूर से बुलाकर विद्यार्थियों को मतदान केंद्र तक पहुंचाया। काश! इतनी ही अच्छी उपस्थिति क्लास में भी हो और विद्यार्थी दूरी को भूलकर नियत समय पर पढ़ने हेतु उपस्थित हों तथा परिवार व समाज उन्हें इसी प्रकार का प्रोत्साहन और सहयोग प्रदान करे।
प्राचीन काल में विद्यार्थी के पढ़ने की प्यास के साथ परिवार व समाज का हर प्रकार का सहयोग गुरुकुलों को प्राप्त होता था और गुरु का कार्य सिर्फ पढ़ना-पढ़ाना था। तभी ज्ञान प्रधान भारत अद्भुत प्रतिभाओं को जन्म दे सका और विश्व का मार्गदर्शक (विश्वगुरु)बन सका।
आज हमारी प्रतिभाएं भारत छोड़कर विदेशों में पढ़ाई के लिए जाने लगी हैं। इसमें समय,शक्ति और धन का जितना भारी अपव्यय हो रहा है, वह चिंता और चिंतन का विषय है।
दूसरी तरफ भारत की शिक्षण संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही हैं, जिसका मुख्य कारण शिक्षकों की भारी कमी और मौजूद शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से लाद देना है।
अनुभव कहता है कि यदि युवा पीढ़ी क्लास की ओर नहीं जा रही है तो वह विनाश की ओर जा रही है। क्योंकि युवाओं में एक आग होती है और शिक्षकों में उस आग से रोशनी पाने की कला। अन्यथा वही आग क्लास के अभाव में कुसंगति में पड़कर अपने ही संसार को जलाती है तभी वीर-बलिदानी-सिक्खों की भूमि पंजाब "उड़ता-पंजाब" में तब्दील हो जाता है।
इस चुनाव में चुना हुआ हर छात्र-नेता यदि क्लास में स्वयं आने लगे और अन्य विद्यार्थियों को भी लाने लगे और शिक्षकों का सदुपयोग सिर्फ पढ़ाने के काम में करने लगे तो भारत के शिक्षण संस्थानों की गौरव-गरिमा पुनः लौट सकती है।
"knowledge is Power" के रहस्य को भारत ने सबसे पहले पहचाना था तभी ऋषियों ने घोषणा की थी- "विद्या ज्योति: परम्" अर्थात् विद्या की ज्योति सबसे परम है क्योंकि उसी से विवेक का जन्म होता है।
इस चुनाव में छात्र नेताओं ने "क्लास की ओर लौटो" का नारा बुलंद कर भारत की सोई आत्मा को पुनः जगाने का शंखनाद किया है। उसे हकीकत बनाना शिक्षकों का काम है। पढ़ने-पढ़ाने के इस यज्ञ के लिए अनुकूल साधन-सुविधाओं को मुहैया कराना और गैर- शैक्षणिक कार्यों से शिक्षकों को मुक्त करना समाज और सरकार का काम है।
Election-urgent,Admission-urgent,Examination urgent हो सकता है तो Class-urgent क्यों नहीं हो सकता?
क्लास के बिना शिक्षण-संस्थाएं उसी प्रकार से हैं जैसे प्राण के बिना कोई शरीर।
लगता है इस बात का इल्म हमारी छात्र शक्ति को हो गया है; क्योंकि-
"रहनुमाओं से दूर युवा भटक जाएगा,
फिर पता नहीं यह देश किधर जाएगा?"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹