संवाद


"सरकारी शिक्षा मॉडल क्यूं बना प्रमुख विमर्श?"


5 सितंबर को छुट्टी होने के कारण एक तरफ "शिक्षक दिवस की शुभकामना" विद्यार्थी शनिवार (3 सितंबर) से ही देने लगे तो दूसरी तरफ सरकारी शिक्षकों की दुर्दशा देखकर मेरे हृदय के भाव संवेदना जताने लगे। कभी पंख खोलकर आकाश में उड़ने वाले शिक्षकों को आज कीचड़ में सना देखकर दुख तो होता है।


मेरे संबंधी पति-पत्नी दोनों सरकारी शिक्षक हैं किंतु उनकी बेटी ने प्राइवेट स्कूल से पढ़कर बोर्ड की परीक्षा में टॉप किया है। बधाई देते हुए मैंने पूछा कि आप दोनों अच्छे अकादमिक रिकॉर्ड वाले अत्यंत प्रतिभाशाली शिक्षक हैं; फिर भी बेटी को दूसरे अत्यंत महंगे प्राइवेट स्कूल में क्यों पढ़ाया?


उनका जवाब था- प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई प्रमुख है और अन्य बातें गौण। वहां नियमित क्लासेज होती हैं , विद्यार्थी की प्रोग्रेस रिपोर्ट पर पैरेंट्स के साथ चर्चाएं होती हैं और विद्यार्थी की कमियों को दूर करने के लिए एक्स्ट्रा क्लासेज लगाई जाती हैं तथा समय पर रिजल्ट दिया जाता है। प्राइवेट स्कूल के शिक्षक सरकारी स्कूल के शिक्षक से कम क्वालिफाइड अवश्य हैं किंतु पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था दुरुस्त होने के कारण ज्यादा समर्पित और परिणाम देने वाले हैं।


मेरा दूसरा प्रश्न उनसे था कि- क्या आपको अफसोस नहीं होता कि आपके बच्चे की सफलता का श्रेय दूसरे प्राइवेट शिक्षा संस्थान और शिक्षक ले जा रहे हैं? क्या ऐसी सफलता सरकारी शिक्षा संस्थान के शिक्षक अपने बच्चों को नहीं दिला सकते?


उनका जवाब मुझे बहुत विचारणीय लगा- जब सरकारी नीतियां गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षक के समय और शक्ति का अपव्यय करेंगी तो सरकारी-शिक्षा दुर्दशा की ओर दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।


सरकारी शिक्षा की दुर्दशा से आंख फेरने वाली प्रवृत्ति देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि इससे एक तरफ शिक्षा गरीब प्रतिभाओं की पहुंच से दूर हो जाएगी और दूसरी तरफ शिक्षा का व्यवसायीकरण इतना बढ़ जाएगा कि मन निर्माण करने वाली शिक्षा मात्र मशीन निर्माण करने वाली बनकर रह जाएगी।


एक तरफ सरकारी शिक्षा संस्थान बंद होते जा रहे हैं और दूसरी तरफ दूरदराज के क्षेत्रों में भी प्राइवेट शिक्षा-संस्थान बढ़ते जा रहे हैं।


ऐसे में दिल्ली सरकार की शिक्षा मॉडल की चर्चा New York Times जैसे प्रतिष्ठित अखबार भी प्रमुखता से कर रहे हैं और देश हो या विदेश सब का ध्यान उसकी ओर जा रहा है। ठीक उसी प्रकार से जैसे राजस्थान सरकार की कोरोना प्रबंधन की तारीफ सर्वत्र हुई थी।


आज देश इस बात में उत्सुक हैं कि किन बदलावों के कारण प्राइवेट संस्थान से बच्चे नाम कटाकर दिल्ली के सरकारी स्कूल में भर्ती होना चाह रहे हैं और इंजीनियरिंग तथा मेडिकल की प्रतिष्ठित परीक्षाओं में भी स्थान बना रहे हैं।


बहुत सारे कारणों में से एक प्रमुख और स्पष्ट कारण है कि वहां शिक्षा का बजट 25% तक कर दिया गया। गैर शैक्षणिक कार्यों से शिक्षकों को मुक्त कर विशेष प्रशिक्षण देकर क्लास की ओर उन्मुख किया गया। आधुनिक तकनीकों और संसाधनों से स्कूलों को लैस किया गया।


आज "देश की शिक्षा कैसी हो?- यह एक प्रमुख चुनावी मुद्दा भी बनता जा रहा है। क्योंकि-


"शिक्षक खाद बनकर जड़ों को पनपाता है


और फूल बनकर हवाओं में लहराता है।।"


"Right to education" तब तक कागजों में ही सिमटा रहेगा जब तक "एक समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा" सभी के लिए उपलब्ध नहीं हो जाती।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


शिक्षक-दिवस की शुभकामना🙏🌹