संवाद


"प्रेम की भाषा से 'भारत जोड़ो' संभव"


चेन्नई जाने हेतु ट्रेन में अहमदाबाद से सवार हुआ। 30 घंटे के लंबे सफर में 24 घंटे तक तो ऐसा महसूस हुआ कि यात्री एक दूसरे की भाषा से पूर्णतया अपरिचित है। बातचीत में जो शब्द-ध्वनियां कानों को सुनाई दे रही थी, उससे ऐसा लग रहा था कि अनेक भाषाओं के यात्री अगल-बगल के डिब्बे में बैठे हुए हैं,जिनकों एक दूसरे की भाषाएं नहीं आतीं। सभी अपनी-अपनी भाषा और अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त।


लेकिन एक ऐसा भी क्षण आया जिसमें विभिन्न भाषा-भाषियों का परस्पर वार्तालाप का दौर शुरू हुआ। संकेतों से आगे बढ़कर टूटे-फूटे शब्दों में एक दूसरे से सामान्य परिचय जब शुरू हुआ तो यह जानकर मैं आश्चर्यचकित हुआ कि उस छोटे से डिब्बे में लघु-भारत उपस्थित था।


गुजराती,तमिल,तेलुगू, हिंदी और मलयालम भाषी लोग "भारत जोड़ो यात्रा" के बारे में अपने विचारों को एक दूसरे तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे और इसमें बहुत सफल हो रहे थे। अधिकतर लोग अपने भावों की अभिव्यक्ति के क्रम में शनै:-शनै: अधिकाधिक हिंदी और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने लगे।


"भारत जोड़ो" के विषय पर ज्यों-ज्यों चर्चा गहरी होती गई त्यों-त्यों हिंदी सब को जोड़ने वाली भाषा के रूप में उभरती गई। एक शिक्षक होने के नाते अपनी बातों को जब मैं प्रेमपूर्ण ढंग से रखने लगा तो सभी की रूचि ज्यादा से ज्यादा बढ़ने लगी। धीमे-धीमे डिब्बे का माहौल परिवार सा हो गया। गुजराती, मलयाली अपने पैसे से खरीद कर सबको नमकीन परोसने लगे तो तमिल, तेलुगू ने चाय के पैसे दे दिए।


लंबी सी अनजान चुप्पी के बाद शुरू हुई बातचीत के दौर में सभी एक दूसरे से ऐसे घुल मिल गए कि पता ही नहीं चला कि उतरने का स्टेशन अब नजदीक आने लगा है। हाथ मिलाकर और मुस्कुराकर अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में कुछ शब्दों का सहज ढंग से आदान-प्रदान कर सभी अपने-अपने स्टेशन पर उतर गए।


आखिर हिंदी जैसी प्रेम की भाषा उस अदृश्य धागे के समान होती है जो रंग बिरंगे फूलों को एक साथ पिरोकर माला का रूप दे देती है।


यह राजनीति की भाषा है जो जोड़ने वाली भाषा जैसी शक्ति को भी तोड़ने वाली शक्ति के रूप में बदल देती है।


हिंदी ने पूरे भारत को जोड़ने का और सभी भारतीयों में स्वतंत्रता की अलख जगाने का महत्वपूर्ण काम किया था,जिसके कारण गुजराती को मातृभाषा मानने वाले गांधी और तमिल को मातृभाषा मानने वाले चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने समवेत स्वर से हिंदी को भारत की आवाज माना था।


किंतु ज्यों ही अनुच्छेद 343 (1) में प्रावधान किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी भारत की राजभाषा होगी; त्यों ही दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध शुरू हो गया जिसका मुख्य नारा था- "English ever,Hindi never" .


नई शिक्षा नीति के तहत भी गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को अनिवार्यतः लागू करने का विचार था किंतु दक्षिण में भारी विरोध को देखते हुए संबंधित प्रावधान को हटा लिया गया।


‌ राजस्थान सरकार द्वारा भी महात्मा गांधी अंग्रेजी मीडियम स्कूल बहुत बड़े पैमाने पर खोले जा रहे हैं; जबकि गांधी जी मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे और अंग्रेजी भाषा थोपने के सख्त विरोध में।


विविधता और परस्पर-आश्रितता जीवन की बहुत बड़ी सच्चाई है। कुछ भाषाएं धर्म के दृष्टिकोण से अपना महत्व रखती हैं तो कुछ भाषाएं विज्ञान के दृष्टिकोण से। जब उनमें परस्पर मेलजोल होता है तो एक दूसरे को समृद्ध करती हैं।


समाज और संस्कृति की कोख से जन्म लेने वाली कोई भी भाषा संवाद का माध्यम होती है। जब राजनीतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए भाषा को साधन बनाया जाता है तो विवाद का प्रारंभ होता है।


बाबा तुलसीदास ने रामचरितमानस तो संस्कृत में शुरू किया था किंतु जन-जन तक पहुंचने के लिए अवधी-भाषा का आश्रय लिया। इसी तरह विभिन्न बोलियां मिलती गईं और हिंदी का स्वरूप निखरता गया।


"का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए सांच


काम जो आवे कामरी,का लै करै कमाच।"


कोई भी भाषा अपनी सहजता और सरलता के साथ लोगों द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण अपना स्थान बना लेती है। वीआईटी चेन्नई जैसे महत्वपूर्ण शिक्षा संस्थान में भी हिंदी भाषी लोगों का और हिंदी भाषा की अच्छी उपस्थिति को देखा।


प्रेम और भक्ति के अपने मूल संदेशों के कारण हिंदी भाषा बढ़ते नफरत को मिटाकर भारत को जोड़ने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है क्योंकि


ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय..


की घोषणा करने वाले कबीर से लेकर रहीम, रसखान, तुलसीदास और सूरदास जैसे अद्भुत व्यक्तित्वों के योगदान से यह भाषा समृद्ध हुई है।


जरूरत इस बात की है कि हिंदी भाषी लोग ज्यादा से ज्यादा भाषाएं सीखने का मानस बनाएं और अपनी हिंदी भाषा के प्रेमपूर्ण संदेशों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए अपनी रचनात्मकता को बढ़ाएं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे


हिंदी दिवस की शुभकामना🙏🌹