संवाद


"फिक्र दुर्गुणों की अवश्य हो किंतु जिक्र ज्यादा हो सद्गुणों का"


चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के MMS वीडियो लीक के मामले पर बहुत गहरे आत्मावलोकन की जरूरत है; किंतु दुर्भाग्य की बात है कि बहुत बड़ा हंगामा हो रहा है।किसी (शिक्षा संस्थान) की छवि को नुकसान होने से बचाने की हमें हर कोशिश करनी चाहिए क्योंकि "बद अच्छा, बदनाम बुरा".


इसके पहले भी शिक्षा संस्थानों में (विशेष रूप से एक बार राजस्थान विश्वविद्यालय में) ऐसे विवाद आए जिसकी गूंज संसद तक सुनने को मिली ; भारी हंगामे से संस्था को भारी बदनामी मिली और बाद में मामला कुछ का कुछ निकला।


समाज में कई प्रकार की विकृतियां पनपती रहती हैं और शिक्षा उसकी प्रकृति को समझ कर नए रास्ते तलाशती है। किंतु समाज की यह विकृति जब शिक्षा-संस्थान में ही घर बनाकर सक्रिय हो जाए तो शिक्षालय,समाज और सरकार सबको मिलजुलकर इस पर गंभीरता से अवश्य विचार करना चाहिए।


ज्ञान के समान पवित्र करने वाली चीज कोई दूसरी नहीं होती- "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते किंचित्।" कृष्ण के मुखारविंद से निकले हुए इस गीता-वाक्य का आशय यही है कि ज्ञान-अग्नि में जलकर सारे दोष नष्ट हो जाते हैं।


किंतु सनसनीखेज खबरों की तलाश में तिल को ताड़ बना कर ज्ञान-केंद्र को ही अग्निसात करने का माहौल बना दिया जा रहा है। इसके कारण कई प्रतिभाशाली लड़कियां जो बाहर निकल कर ज्ञान के आकाश में उड़ने की कला सीखने के लिए वहां पहुंचना चाहती हैं, वे कहीं डरकर अपने पिंजरे से बाहर निकलने का विचार ही न छोड़ दें।


ऐसी दुर्घटनाओं को यदि सही ढंग से डील किया जाए तो वे लड़कियों के बाहर निकलने के मार्ग में ज्यादा बाधक नहीं बन सकती हैं। टूटने के डर से कोई खिलौना बनाना नहीं छोड़ता। गिरने के डर से कोई पर्वतों पर चढ़ना नहीं छोड़ देता। लड़कियों को बाहर निकलने में जितनी भी चुनौतियां मिली हैं, उन्होंने राह के उन पत्थरों को अपनी सीढ़ियां बना लिया हैं।


शिक्षा की गोद में प्रकृति को संस्कृति में तब्दील करने का यज्ञ भी सफलतापूर्वक चल रहा है। अभी दिल्ली के सरकारी स्कूलों से गरीब घरों के बहुत सारे लड़के-लड़कियों ने इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की परीक्षा में शिक्षकों की सहायता से अद्भुत सफलता अर्जित की हैं जिसमें समाज और सरकार का सहयोग भी प्रशंसनीय है।


किंतु क्या विकृति को जितना मीडिया-कवरेज मिल रहा है,उतना संस्कृति को भी मिलता है?


शिक्षा-दर्शन कहता है कि फिक्र अवश्य हो दुर्गुणों की , किंतु जिक्र ज्यादा से ज्यादा हो सद्गुणों का ; ताकि आंतरिक-जगत में सम्यक-आलोचना भी चलती रहे और बाहरी-जगत में आशा का संचार भी होता रहे-


"कमियों का एहसास भी हो,


पर शक्तियों का विश्वास भी हो।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹