जिंदा देवी का अंतिम संस्कार, कैसे सजेगा देवी-दरबार?
September 25, 2022🙏अश्रुपूरित श्रद्धांजलि🙏
"जिंदा देवी का अंतिम संस्कार, कैसे सजेगा देवी-दरबार?"
देवभूमि में जिंदा देवी के साथ जो हुआ, वह हमारे 'देवत्व' को और "देवी के प्रति हमारे दृष्टिकोण" को जगजाहिर कर रहा है। हमारी चेतना इतनी सो हो गई है कि आज कन्या "अंकिता" का अंतिम संस्कार करके कल से कन्या के नौ रूपों की आराधना में देवी का दरबार सजा लेंगे तथा ऊंचे स्वर में देवी स्तुति मंत्रोच्चार करेंगे.....
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।"
कल से शक्ति की उपासना का पर्व शुरू हो रहा है और "Power makes man corrupt"अर्थात् शक्ति भ्रष्ट करती है, यह अंकिता केस में आंखों के सामने घूम रहा है। श्रद्धा और शंका के बीच मन इतना दोलायमान हो गया है कि कुछ सूझ नहीं रहा है। कन्या पूजक यह समाज कन्या की भ्रूण हत्या से लेकर सती प्रथा तक के पाशविक कृत्यों को करता रहा था, अब अत्याचार व शोषण के नए तरीके ईजाद कर रहा है। "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते" का मंत्र जपने वाला यही समाज "न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति" अर्थात् 'स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है' की खुली घोषणा करता है।
विज्ञान के आविष्कारों और आधुनिकता के दबावों से स्त्री की स्थिति तेजी से बदल रही है किंतु पुरुषवादी-दृष्टिकोण नहीं बदल पा रहा है। बलात्कारी को जब संस्कारी बताया जाए और उसे समाज द्वारा फूल-माला पहनाया जाए तो समझ लीजिए कि यह ग्रह नर-नारी समानता वाला "अर्धनारीश्वर का ग्रह" कभी नहीं बन सकता।
और जिस ग्रह पर नारी दोयम दर्जे की हो, उस ग्रह पर पुरुष हीन से हीनतर होगा क्योंकि जन्म तो स्त्री-गर्भ से ही होना है। मामला हिजाब पहनाने का हो या दासी बनाने का; मूल सोच एक ही है कि 'स्त्री पुरुष की तरह एक स्वतंत्र आत्मा नहीं है,केवल एक वस्तु है और पुरुषों का अंतिम उपनिवेश है' जिस पर पुरुषवादी-मानसिकता अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती है।
स्वतंत्रता और समानता की मांग करने वाली इस नई दुनिया में सिर्फ परिस्थिति बदलने से कुछ विशेष नहीं बदलने वाला है; जब तक मन:स्थिति नहीं बदलती और नर नारी एक दूसरे के पूरक होने के भाव से नहीं भरते।
नवरात्रि की आराधना आत्मशक्ति जागरण की साधना है और यह आत्मशक्ति स्त्री पुरुष में ही नहीं बल्कि चर अचर में भी समान रूप से विद्यमान है। साधना द्वारा उस आत्मशक्ति के दर्शन सर्वत्र होने लगते हैं और यह साधना मन में, वन में और कोने में (मने-वने-कोणे)होती है। किंतु देवी के मंदिर और पंडाल में भारी भीड़ द्वारा पाषाण की प्रतिमा का विभिन्न श्रृंगार कर जय जय कार किया जाएगा और जिंदा रूप में आई देवियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा-
"क्या ऐसा समाज कभी देवी उपासना कर पाएगा?
क्या देवी का प्रसाद कभी हम पर बरस पाएगा??"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹